5 बड़े सवाल क्या नगर निगम किसी बड़े हादसे का इंतज़ार कर रहा है? बिना सुरक्षा बिजली खंभों पर जान जोखिम में डालते मजदूर

5 बड़े सवाल क्या किसी बड़े हादसे का इंतज़ार कर रहा है नगर निगम?

बिना सुरक्षा ऊंचे बिजली खंभों पर जान जोखिम में डाल काम कर रहे मजदूर

शहर के विकास, रोशनी और सुचारु बिजली व्यवस्था के लिए हर दिन सैकड़ों मजदूर अपनी जान जोखिम में डालकर काम कर रहे हैं। ऊंचे-ऊंचे बिजली खंभों पर चढ़कर लाइन सुधारना, ट्रांसफॉर्मर के आसपास काम करना, तार बदलना या स्ट्रीट लाइट दुरुस्त करना—ये सब काम ऐसे हैं जिनमें एक छोटी-सी चूक भी जानलेवा साबित हो सकती है। बावजूद इसके, कई जगहों पर मजदूरों को न तो हेलमेट मिलता है, न सेफ्टी बेल्ट, न ही इंसुलेटेड दस्ताने या जूते। सवाल उठता है—क्या नगर निगम किसी बड़े हादसे का इंतज़ार कर रहा है?


शहर की सड़कों पर दिखती खतरनाक तस्वीर

सुबह-शाम शहर के अलग-अलग इलाकों में आमतौर पर देखा जा सकता है कि बिजली विभाग या नगर निगम से जुड़े मजदूर बिना किसी सुरक्षा उपकरण के खंभों पर चढ़े हुए हैं। कई बार तो वे नंगे हाथों से तार पकड़ते हैं, पैरों में साधारण चप्पल या जूते होते हैं और सिर पर हेलमेट तक नहीं।

इन खंभों की ऊंचाई 25 से 40 फीट तक होती है। नीचे सड़क पर वाहन दौड़ रहे होते हैं, लोग आ-जा रहे होते हैं और ऊपर मजदूर सिर्फ अपनी हिम्मत के भरोसे काम कर रहा होता है। ऐसे में यदि संतुलन बिगड़ा, करंट लगा या अचानक लाइन चालू हो गई—तो परिणाम भयावह हो सकता है।

 हमारे शहर रायगढ़ में इन दिनों नगर निगम क्षेत्र के सौंदर्यीकरण का काम काफी तेज़ी से चल रहा है। शहर को नया रूप देने के लिए बिजली के खंभों की पुताई का जिम्मा ठेकेदारों को सौंपा गया है, लेकिन इस चमक-धमक के पीछे एक बेहद डरावनी तस्वीर सामने आई है। जो मजदूर हमारे शहर की सड़कों को रोशन करने वाले खंभों को चमका रहे हैं, उनकी अपनी जिंदगी की सुरक्षा को पूरी तरह से ताक पर रख दिया गया है।

रायगढ़ के जागरूक नागरिकों के लिए यह खबर इसलिए चिंताजनक है क्योंकि यह सीधे तौर पर इंसानियत और सुरक्षा नियमों की भारी अनदेखी से जुड़ी है। तस्वीरों में साफ देखा जा सकता है कि नगर निगम क्षेत्र में बिजली के खंभों की पुताई का काम बिना किसी सुरक्षा उपकरण के कराया जा रहा है।ये मजदूर जमीन से काफी ऊंचाई पर काम कर रहे हैं, लेकिन हैरानी की बात यह है कि उनके पास न तो सिर बचाने के लिए हेलमेट है और न ही ऊंचाई पर लटकने के लिए जरूरी सेफ्टी बेल्ट। यहाँ तक कि किसी आपात स्थिति से बचने के लिए सुरक्षा रस्सी का सहारा भी नहीं लिया गया है।

खंभों की ऊंचाई इतनी अधिक है कि वहाँ से पैर का एक मामूली सा फिसलना या एक छोटी सी चूक भी सीधे तौर पर किसी बड़े जानलेवा हादसे में बदल सकती है। इस पूरी लापरवाही को देखकर स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश है और सोशल मीडिया पर भी लोग सवाल उठा रहे हैं।

रायगढ़ के रहवासियों का कहना है कि विकास के नाम पर मजदूरों की जान से इस तरह का खिलवाड़ कतई बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। लोग सीधा सवाल कर रहे हैं कि अगर काम के दौरान कोई मजदूर गिर जाता है या उसे कुछ हो जाता है, तो इसकी पूरी जिम्मेदारी कौन लेगा?क्या नगर निगम ने संबंधित ठेकेदारों को मजदूरों की सुरक्षा के लिए कोई कड़े निर्देश नहीं दिए हैं या फिर ठेकेदार जानबूझकर इन नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं?

अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या रायगढ़ प्रशासन किसी अनहोनी का इंतजार कर रहा है? मजदूरों की जान की शायद सिस्टम की नज़र में कोई कीमत नहीं रह गई है, तभी तो बीच शहर में इस तरह की खतरनाक लापरवाही खुलेआम जारी है। फिलहाल शहर की जनता चाहती है कि जिम्मेदार अधिकारी इस पर तुरंत संज्ञान लें और ठेकेदारों को सुरक्षा नियमों का सख्ती से पालन करने का आदेश दें, ताकि रायगढ़ की सड़कों पर कोई मजदूर अपनी जान न गंवाए।


सुरक्षा उपकरण क्यों हैं ज़रूरी?

बिजली से जुड़ा हर काम हाई रिस्क जॉब माना जाता है। अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर इसके लिए स्पष्ट सुरक्षा मानक तय हैं, जिनमें शामिल हैं—

  • सेफ्टी हेलमेट – गिरने वाली वस्तुओं और सिर में चोट से बचाव

  • सेफ्टी बेल्ट/हार्नेस – ऊंचाई से गिरने के खतरे को कम करने के लिए

  • इंसुलेटेड दस्ताने – करंट से सुरक्षा

  • रबर सोल वाले जूते – बिजली के झटके से बचाव

  • वोल्टेज टेस्टर और सेफ्टी स्टिक – यह सुनिश्चित करने के लिए कि लाइन बंद है

इनमें से किसी एक की भी कमी सीधे मजदूर की जान को खतरे में डालती है।


हादसों का इतिहास: चेतावनी देने वाली घटनाएं

पिछले कुछ वर्षों में देश के अलग-अलग हिस्सों से ऐसी कई खबरें सामने आई हैं, जहां बिजली लाइन पर काम करते समय मजदूरों की मौत हो गई या वे गंभीर रूप से घायल हो गए। कहीं अचानक लाइन चालू हो गई, कहीं संतुलन बिगड़ गया, तो कहीं उपकरणों की कमी जानलेवा साबित हुई।

इन हादसों के बाद कुछ दिनों तक शोर जरूर मचता है, जांच के आदेश भी दिए जाते हैं, लेकिन समय बीतते ही सब कुछ फिर से पुराने ढर्रे पर चलने लगता है।


नगर निगम और ठेकेदारी व्यवस्था

अक्सर नगर निगम सीधे मजदूरों को नियुक्त नहीं करता, बल्कि ठेकेदारों के माध्यम से काम करवाया जाता है। यही ठेकेदारी व्यवस्था कई समस्याओं की जड़ बन जाती है—

  1. कम लागत में ज्यादा मुनाफा – ठेकेदार सुरक्षा उपकरणों पर खर्च बचाने की कोशिश करते हैं।

  2. जवाबदेही का अभाव – हादसे की स्थिति में जिम्मेदारी एक-दूसरे पर डाली जाती है।

  3. मजदूरों की मजबूरी – रोजी-रोटी के लिए मजदूर बिना सवाल किए जोखिम उठाने को मजबूर होते हैं।

नतीजा यह कि नियम कागजों तक सीमित रह जाते हैं और ज़मीनी हकीकत कुछ और ही होती है।


क्या कहता है कानून?

भारतीय श्रम कानून और विद्युत सुरक्षा नियमों के अनुसार, किसी भी मजदूर से खतरनाक कार्य करवाने से पहले—

  • उसे उचित प्रशिक्षण देना अनिवार्य है

  • सुरक्षा उपकरण उपलब्ध कराना नियोक्ता की जिम्मेदारी है

  • कार्यस्थल पर सुरक्षा मानकों का पालन अनिवार्य है

यदि इन नियमों का उल्लंघन होता है और कोई हादसा घटता है, तो इसके लिए संबंधित विभाग और ठेकेदार दोनों जिम्मेदार माने जाते हैं। Amar Ujala


मजदूरों की चुप्पी के पीछे की मजबूरी

अक्सर सवाल उठता है कि मजदूर खुद सुरक्षा की मांग क्यों नहीं करते? इसका जवाब उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति में छिपा है।

  • दिहाड़ी मजदूरी पर काम

  • नौकरी जाने का डर

  • विकल्पों की कमी

  • प्रशासन और ठेकेदारों से टकराने की हिम्मत न होना

इन परिस्थितियों में मजदूर जान जोखिम में डालकर भी काम करने को मजबूर हो जाता है।


आम जनता की भूमिका

यह समस्या सिर्फ मजदूरों या नगर निगम की नहीं, बल्कि पूरे समाज की है। जब हम सड़क पर किसी मजदूर को बिना सुरक्षा खंभे पर चढ़ा देखते हैं और चुपचाप आगे बढ़ जाते हैं, तो कहीं न कहीं हम भी इस लापरवाही का हिस्सा बन जाते हैं।

आम नागरिक—

  • शिकायत दर्ज करा सकते हैं

  • फोटो/वीडियो के माध्यम से प्रशासन का ध्यान खींच सकते हैं

  • जनप्रतिनिधियों से सवाल पूछ सकते हैं

जन दबाव से ही अक्सर व्यवस्था में बदलाव आता है।


संभावित बड़े हादसे का खतरा

अगर इसी तरह बिना सुरक्षा काम चलता रहा, तो यह सिर्फ समय की बात है कि कोई बड़ा हादसा हो। एक ही घटना में—

  • मजदूर की जान जा सकती है

  • परिवार पूरी तरह बिखर सकता है

  • नगर निगम पर भारी मुआवजा बोझ पड़ सकता है

  • शहर की छवि धूमिल हो सकती है

फिर सवाल उठेगा—जब सब कुछ पहले से पता था, तो समय रहते कदम क्यों नहीं उठाए गए?


समाधान क्या हो सकते हैं?

इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए ठोस कदम जरूरी हैं—

  1. सुरक्षा उपकरणों की अनिवार्य उपलब्धता

  2. काम शुरू होने से पहले सुरक्षा जांच

  3. मजदूरों का नियमित प्रशिक्षण

  4. ठेकेदारों पर सख्त निगरानी और दंड

  5. हादसे की स्थिति में त्वरित और पारदर्शी कार्रवाई

साथ ही, नगर निगम को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कोई भी काम बिना सुरक्षा मानकों के न कराया जाए।

बिजली खंभों पर बिना सुरक्षा काम कर रहे मजदूर सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि एक चेतावनी हैं। यह चेतावनी नगर निगम, ठेकेदारों, प्रशासन और समाज—सबके लिए है। यदि आज भी आंखें मूंद ली गईं, तो कल किसी बड़े हादसे की जिम्मेदारी से कोई नहीं बच पाएगा।

अब सवाल सिर्फ यही है—क्या नगर निगम किसी बड़े हादसे का इंतज़ार कर रहा है, या समय रहते मजदूरों की सुरक्षा को प्राथमिकता देगा?
इसका जवाब आने वाला समय देगा, लेकिन तब तक एक-एक दिन, एक-एक मजदूर की जान खतरे में है।

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