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“रायगढ़ में MARKFED की फिजूलखर्ची 19 लाख अनुपयोगी बारदाने पर 50 लाख रुपये खर्च”

रायगढ़ में MARKFED का फिजूलखर्ची 19 लाख अनुपयोगी बारदाने का विवाद – एक गंभीर वित्तीय मुद्दा

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में MARKFED (छत्तीसगढ़ स्टेट को‑ऑपरेटिव मार्केटिंग फेडरेशन) द्वारा 19 लाख से अधिक अनुपयोगी बारदानों पर पांच वर्षों में लगभग 50 लाख रुपये खर्च किए जाने का मामला हाल ही में सामने आया है। ये खर्च सिर्फ बारदानों को भंडारित करने, रख‑रखाव, सुरक्षा तथा गोदाम किराया पर किए गए हैं, जबकि इन बारदानों का कोई उपयोग नहीं हुआ। यह मामला स्थानीय स्तर पर “फिजूलखर्ची में नंबर वन” के रूप में उभर कर सामने आया है।


 बारदाने क्या हैं और उनकी भूमिका

बारदाने (Gunny bags) साधारण तौर पर धान जैसी कृषि उपज को खरीद, भंडारण और परिवहन के लिए उपयोग होने वाले मजबूत बुने हुए बोरे होते हैं। खरीफ सीज़न में समर्थन मूल्य (MSP) पर धान खरीद के दौरान इन बारदानों का उपयोग प्रमुख रूप से होता है। लेकिन जब ये अनुपयोगी हो जाते हैं, तब भी उनका सही निपटान, विक्रय या नवीनीकरण आवश्यक होता है।

 जो बारदाने किसी काम के नहीं है, उनको रखने के लिए मार्कफेड हर साल दस लाख रुपए खर्च कर रहा है। रायगढ़ जिले में करीब 19 लाख अनुपयोगी बारदानों के पीछे पांच साल में करीब 50 लाख व्यय हो चुके हैं। प्रारंभ से अब तक की गणना करें तो केवल रायगढ़ जिले का खर्च एक करोड़ से अधिक होगा। प्रतिवर्ष धान खरीदी के दौरान बारदानों की आपूर्ति होती है। कई गठान बारदाने अमानक भी हो जाते हैं और अनुपयोगी भी। मार्कफेड के नियम बड़े अजीब हैं।

अनुपयोगी बारदानों की गिनती तो पूरी है लेकिन इनका निराकरण नहीं किया जा रहा है। कई बार नीलामी का प्रयास किया गया लेकिन कोई खरीदने ही नहीं आया। रायगढ़ जिले में कुल 19,00,001 अनुपयोगी बारदाने हैं। ये बारदाने किराए के गोदामों में भंडारित हैं। इनकी कीमत प्रति बारदाना एक रुपए आंकी गई है। रायगढ़ जिले में इन 19 लाख बारदानों को रखने के लिए वर्ष 20-21 से अब तक 48,98,552 रुपए खर्च किए जा चुके हैं।

दिलचस्प बात यह है कि जिन बारदानों का भविष्य में कोई उपयोग ही नहीं किया जा सकता, उसके लिए लाखों रुपए फूंके जा चुके हैं। अब ये बारदाने मार्कफेड की गले की फांस बन गए हैं। यह बारदाने सडक़र कचरा बन चुके हैं, लेकिन कोई इनका निराकरण नहीं कर पा रहा है। यह पांच साल पहले से भंडारित हैं, ऐसा नहीं है। करीब 2012 से यह बारदाने रखे गए हैं। तब से अब तक गणना करें, तो एक करोड़ से भी ज्यादा राशि खर्च की जा चुकी है।

प्रदेश में करीब 16 जिलों में ऐसे बारदाने रखे हुए हैं। इन पांच सालों में सड़े-गले बारदानों पर मार्कफेड सात करोड़ रुपए खर्च कर चुका है। इसका भुगतान करने में अधिकारी देर नहीं लगाते। एसडब्ल्यूसी और दूसरे निजी गोदाम मालिकों को हर साल बिना रुके भुगतान किया जा रहा है। नीलामी करने का प्रयास किया गया था लेकिन कोई खरीदार ही नहीं आया। Kelo Pravah

वित्त विभाग को मालूम ही नहीं

मितव्ययिता के बजाय सरकार मनमाने तरीके से खर्च कर रही है। सोचिए कि मार्कफेड बिना कुछ सोचे-समझे करोड़ों रुपए ऐसे बारदानों पर खर्च कर चुका है जिनकी गिनती भी नहीं हो सकती। दस साल से भी ज्यादा समय से बारदाने बेकार पड़े हुए हैं। इनका कहीं भी उपयोग नहीं हो सकता। विपणन संघ से संबंधित होने के कारण वित्त विभाग को इसका पता भी नहीं चलता। व्यर्थ में बहाए जा रहे करोड़ों रुपए के लिए वित्त विभाग की अनुमति लेने की जरूरत भी नहीं पड़ती।


 क्या हुआ इस मामले में – तथ्य और आंकड़े

 अनुपयोगी बारदाने की संख्या

 खर्च की राशि

 खर्च कहाँ हुआ

यह राशि मुख्यतः निम्नलिखित मदों पर खर्च हुई:


 समस्या की गहराई

उपासना यह है कि ये बारदाने “अनुपयोगी” घोषित हैं, यानी:

फिर भी, MARKFED ने इन पर हर साल लाखों रुपए खर्च करना जारी रखा — जिससे यह आरोप उठे कि सरकार और MARKFED वित्तीय नियमों का पालन नहीं कर रहे।


 क्या नीलामी या अन्य उपाय हुए

सूचना के अनुसार, इस भारी संख्या में अनुपयोगी बारदानों का निपटान करने के लिए कई बार नीलामी का प्रयास किया गया — लेकिन कोई खरीदार नहीं आया, क्योंकि किसी को भी इन अनुपयोगी बारदानों में दिलचस्पी नहीं थी। इसका मतलब यह है कि इन बोरो से कोई व्यावसायिक मूल्य भी नहीं मिल रहा था, फिर भी वित्तीय खर्च हो रहा था।


 MARKFED के नियम और वित्त विभाग की भूमिका

यह मामला इसलिए भी गंभीर है कि:

सरकारी नियमों के अनुसार किसी भी सार्वजनिक संस्था को अनावश्यक खर्च से पहले अनुमोदन लेना आवश्यक होता है, विशेषकर यदि यह खर्च लाखों रूपये का हो।


 ऐतिहासिक संदर्भ

छत्तीसगढ़ में MARKFED से जुड़ा भ्रष्टाचार या वित्तीय गड़बड़ी का मामला पहले भी समाचारों में आया है। इससे यह साफ है कि MARKFED में निगरानी और पारदर्शिता की कमी एक बार-बार उठने वाला मुद्दा है।


 बारदानों की हालत और उपयोग की कमी

अनुपयोगी बारदानों का मुख्य कारण यह था कि वे:

इनका निपटान न होने के कारण यह बोरे वर्षों से गोदामों में पड़े रहे और उनकी संख्या में भी वृद्धि होती चली। इस स्थिति में इन पर खर्च करना आर्थिक दृष्टि से अनुचित माना जाता है।


 अनुमानों का तुलनात्मक विश्लेषण

मद आंकड़ा
अनुपयोगी बारदाने 19,00,001
पाँच वर्षों में कुल खर्च लगभग 50 लाख रुपये
औसत प्रति वर्ष खर्च लगभग 10 लाख रुपये
संभावित कुल खर्च (10+ वर्षों से) 1 करोड़ से अधिक
नीलामी में हिस्सा बिना खरीदार

यह तालिका स्पष्ट करती है कि केवल बारदानों को संचित रखने पर भी भारी राशि खर्च होती रही, जिसका उपयोग कहीं नहीं हुआ।


 आलोचना और सवाल

  1. क्यों वित्त विभाग को इस खर्च का पता नहीं चला?

  2. क्या MARKFED ने वैकल्पिक उपयोग (reuse/recycle) पर कोई योजना बनाई?

  3. क्या इस खर्च की जांच आवश्यक है?

  4. आधुनिक भंडारण तकनीक और बेहतर प्रणाली क्यों नहीं अपनाई गई?

इन सवालों का जवाब होना आवश्यक है।


 समाधान – भविष्य के लिए कदम

 निरीक्षण और लेखा परीक्षा

नियमित लेखा परीक्षण से आय और व्यय पारदर्शी बन सकते हैं।

 नीलामी/रिसाइक्लिंग

अनुपयोगी बारदानों को बेचना संभव न होने पर उन्हें रीसाइक्लिंग/औद्योगिक उपयोग हेतु भेजा जाए।

 आधुनिक भंडारण और ट्रैकिंग सिस्टम

डिजिटल मॉनिटरिंग से गोदाम और संसाधन की स्थिति ट्रैक की जा सकती है।

 सार्वजनिक जवाबदेही

जनता को खर्च और निर्णयों की जानकारी उपलब्ध कराकर उत्तरदायित्व तय किया जा सकता है।

रायगढ़ में MARKFED द्वारा अनुपयोगी बारदानों पर पांच साल में 50 लाख रुपये से अधिक खर्च करने का मामला सिर्फ एक स्थानीय खबर नहीं, बल्कि यह सरकारी संसाधन के कुशल उपयोग, जवाबदेही और वित्तीय अनुशासन की आवश्यकता का प्रतीक है।

इस मुद्दे से यह सीख मिलती है कि सरकारी संस्थाओं को समय‑समय पर अपने संसाधनों का मूल्यांकन और नवीनीकरण करना चाहिए, ताकि अनावश्यक खर्च से बचा जा सके और धन का सही उपयोग हो सके।

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