देवउठनी एकादशी करें ये उपाय, जल्द बजेगी शादी की शहनाई

हिन्दू धर्म में अनेक व्रत-उत्सव ऐसे हैं जो जीवन के-उत्सव, शुभ काम एवं धर्म-संस्कार को प्रोत्साहित करते हैं। उन में से एक बेहद महत्वपूर्ण व्रत है देवउठनी एकादशी (जिसे प्रबोधिनी एकादशी या देवोत्त्थान एकादशी भी कहा जाता है)। कहा जाता है कि इस दिन से पुनः शुभ कार्य जैसे विवाह, गृह-प्रवेश, व्यवसायिक शुभारंभ आदि प्रारंभ होते हैं। इस लेख में हम जानेंगे इस व्रत की तिथि-समय, पूजा-विधि, मुख्य उपाय और विशेष रूप से शादी को जल्दी सम्पन्न कराने हेतु उपाय के बारे में।
देवउठनी एकादशी तिथि व मूल विवरण

-
देवउठनी एकादशी उस कर्तिक मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि है, जब विष्णु देव चार-महीने की योगनिद्रा (चतुर्मास) से जागते हैं।
-
इस दिन को इसलिए विशेष माना गया क्योंकि उस चार-महीने की अवधि में शुभकार्य व विवाह आदि टाले जाते थे। इस तिथि से पुन शुभ कार्यों का आरंभ होता है।
-
उदाहरण के लिए, 2025 में इस तिथि के संबंध में स्रोतों में उल्लेख है कि यह 1-2 नवंबर के आसपास मनाई जाएगी।
मुख्य धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व

-
यज्ञ और चतुर्मास का अंत: चतुर्मास वह अवधि है जिसमें विष्णु देव योगनिद्रा में माने जाते हैं, और उस दौरान अधिकांश शुभकार्य नहीं किये जाते। देवउठनी एकादशी उस अवधि के समाप्ति का प्रतीक है। The Times of India+1
-
शुभ कार्यों की पुनः शुरुआत: विवाह, गृह-प्रवेश (गृहप्रवेश), व्यवसाय संबंधी शुभारंभ आदि अब फिर से शुरू हो सकते हैं।
-
विष्णु-पूजा व तુષ्लिविवाह: इस दिन तुलसी विवाह (तुलसी पौधे का भगवान विष्णु से विवाह) की परंपरा भी है, जो धर्म-संस्कारिक दृष्टि से बहुत शुभ माना जाता है।
-
आध्यात्मिक एवं सामाजिक संकेत: यह दिन “जागृति” का प्रतीक है — अधिष्ठित शक्तियों का पुनरुत्थान और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का आरंभ।
विवाह-शादी के लिए क्यों शुभ?
-
चतुर्मास के दौरान विवाह आदि अधिकांश हिन्दू परंपराओं में टाले जाते थे। देवउठनी एकादशी के बाद यह रोक स्वयं ही “समाप्त” मानी जाती है। इसलिए इस तिथि के बाद विवाह योग्य कार्यों में बढ़ोतरी होती है।
-
विवाह यानी जीवन की नई शुरुआत के लिए यह दिन “शुभ आरंभ” का प्रतीक बन जाता है। इस कारण “शादी को जल्दी सम्पन्न कराने” वाले उपाय अक्सर इसी तिथि से जुड़े रहते हैं।
-
इस अवसर पर जो उपाय और पूजा-विधि अपनाई जाती है, उन्हें करने से शुभ समय का लाभ माना गया है।
पूजा-विधि एवं मुख्य उपाय
पूजा-विधि संक्षिप्त रूप में
-
प्रातः समय उठकर स्नान करें, साफ-सफाई करें और पूजा-स्थल तैयार करें।
-
भगवान विष्णु व देवी लक्ष्मी की स्थापना करें। तुलसी पौधे को सम्मान दें।
-
पंचामृत-अभिषेक, तुलसी-पत्र अर्पण, दीपदान, मन्त्र जप (जैसे “ॐ नमो नारायणाय”) करें। The
-
दान-पुण्य करें — विशेष रूप से ब्राह्मणों को भोजन-दान, धन-दान व वस्त्र-दान पर जोर है।
विशेष उपाय शादी-शहनाई हेतु
-
विवाह-योग के अनुकूल समय की शुरुआत इस तिथि से मानी जाती है — इसलिए इस दिन या इसके अगले दिनों विवाह की तिथि तय करना शुभ माना जाता है।
-
तुलसी पौधे के समक्ष दीप दान करें तथा घर के प्रवेश द्वार पर दीपक लगाएं — इससे सौभाग्य एवं मंगल की वृद्धि मानी जाती है।
-
स्वयं व सामग्री को शुद्ध रखें — खाली समय निकालकर मन को संयमित, शांत और सकारात्मक बनाएं।
-
पूजा के पश्चात् अपने परिवार व मित्र-सम्बंधियों को शुभ कार्य की सूचना दें — सामाजिक सहयोग एवं शुभारंभ का माहौल बने।
-
विवाह की पूर्व तैयारी (सगाई, ज्येष्ठ कार्य, निमंत्रण आदि) इस दिन से आरंभ करना शुभ माना जाता है।
सही मुहूर्त और दिन-समय
-
तिथि में भिन्नता हो सकती है — इसलिए स्थानीय पंचांग देखकर मुहूर्त को अवश्य देखें।
-
उपरोक्त स्रोतों में बताया गया है कि तिथि का आरंभ शाम के बाद हो सकता है, इसलिए अगली सुबह से पूजा-व्रत करना शुभ माना जाता है।
-
विवाह हेतु समय-निर्धारण में ‘शुभ मुहूर्त’, ‘लग्न योग’, ‘वार’ आदि देखना आवश्यक है — चूंकि देवउठनी एकादशी से शुभ कार्य पुनः आरंभ होते हैं, इस दिन से आगे का समय विशेष लाभदायी माना जाता है।
उपाय सूची
-
तुलसी वृक्ष को जल अर्पित करें, गोमूत्र या दूध चढ़ाएं, घी का दीप लगाएं।
-
दीपक जितना संभव हो घर के आँगन-प्रवेश द्वार पर लगाएं — विशेष रूप से विवाह के लिए शुभ संकेत।
-
शुभ कार्य (जैसे सगाई, विवाह, गृह-प्रवेश) तत्काल आरंभ करें — या इस दिन से अपनी योजनाएँ तय करें।
-
कम-से-कम दस ब्राह्मण को भोजन व वस्त्र दान करें।
-
मन को मोह-माया से मुक्त रखें। उपवास या सीमित भोजन करना श्रेष्ठ है।
-
विष्णु सहस्रनाम, भगवद्-गीता का पाठ या तुलसी-चालीसा आदि करें।
-
अगले दिन (तथा अगले शुभ दिन) विवाह का निर्णय लें, शुभ मुहूर्त देखें।
मिथक-कथा एवं पौराणिक प्रसंग
-
कथा अनुसार, भगवान विष्णु चार-महीने की योगनिद्रा (चतुर्मास) में रहते हैं, और इस एकादशी के दिन जागते हैं।
-
ऐसा कहा जाता है कि चतुर्मास के दौरान देव-देवताओं का “विश्वव्यवहार” शांत होता है और शुभ कर्म ठप रहते हैं। जागृति-दिन से फिर संसार कार्यों का प्रवाह आरंभ होता है।
-
विवाह-संभरण के लिए शुभ मान्यता इसी से जुड़ी हुई है — जैसे “विष्णु जागे, सब काम शुभ”-भाव।
सावधानियाँ एवं उपेक्षित बातें
-
व्रत के दौरान अनिष्ट कर्म (जुआ-शराब-मांसाहार-हनन आदि) से बचें। India TV News
-
तिथि-पंचांग नहीं देखा हो तो स्थानीय पुजारी या ज्योतिष से सलाह लें।
-
उपाय करते समय मन में संकल्प-विश्वास होना आवश्यक है — उपाय मात्र रूप से नहीं।
-
विवाह के लिए सिर्फ एकादशी दिन पर निर्भर न रहें — शुभ मुहूर्त, परिवार-समर्थन एवं सामाजिक व्यवस्था भी महत्वपूर्ण है।
अगर आप सोच रहे हैं “शादी जल्दी कब होगी?” या “विवाह-कार्यों के लिए शुभ समय कब है?”, तो देवउठनी एकादशी आपके लिए एक बहुत शुभ अवसर है। इस दिन से व्रत-पूजा-उपाय करके, शुभ कार्यों की शुरुआत करके, विवाह-संबंधित निर्णय लेकर आप अपने जीवन में मंगल-शुभ की दिशा ले सकते हैं।
हालाँकि शादी केवल एक दिन का आयोजन नहीं — यह जीवन-यात्रा की शुरुआत है — इसलिए जागरूक रूप से तैयारी करें, सच्चे मन से पूजा-उपाय करें, और सामाजिक, मानसिक व आध्यात्मिक रूप से संतुलित विवाह-यात्रा का आरंभ करें।
इस प्रकार, देवउठनी एकादशी के इस आलेख-मार्गदर्शन से आप न सिर्फ व्रत-उपाय जान पाएँगे, बल्कि शादी-शहनाई के शुभ-प्रारंभ के लिए भी प्रेरणा पा सकते हैं।
Next –
2 thoughts on “देवउठनी एकादशी 2025 करें ये उपाय और पाएं शादी का शुभ योग”