न अतिक्रमण रुका, न रिकॉर्ड दुरुस्त हुए, बाहरी लोगों ने कब्जाई जलाशय की 1 जमीन

जल संसाधन और जलाशय केवल पानी के संग्रह का साधन नहीं हैं, बल्कि ये कृषि, पारिस्थितिक संतुलन और स्थानीय जीवन के लिए महत्वपूर्ण हैं। जलाशयों की जमीन पर अतिक्रमण न केवल पर्यावरणीय संकट पैदा करता है, बल्कि सामाजिक और आर्थिक समस्याओं को भी जन्म देता है। रायगढ़ जिले के कोकड़ीतराई जलाशय की जमीन पर हाल ही में यह समस्या गंभीर रूप में सामने आई है।
जहाँ न तो अतिक्रमण रुका है और न ही सरकारी रिकॉर्ड दुरुस्त हुए हैं, वहीं बाहरी लोग इस जमीन पर कब्जा कर रहे हैं। यह समस्या केवल स्थानीय नहीं बल्कि पूरे राज्य और देश के लिए गंभीर चेतावनी है कि कैसे सरकारी रिकॉर्ड की लापरवाही और अतिक्रमण भूमि संरक्षण की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं।
कोकड़ीतराई जलाशय का इतिहास
कोकड़ीतराई जलाशय का निर्माण 1978 में किया गया था। इसके लिए आसपास के गांवों की भूमि को अधिगृहित किया गया।
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उच्चभिट्ठी गांव: 46 किसानों की लगभग 31 हेक्टेयर भूमि
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परसदा गांव: 41 किसानों की लगभग 32 हेक्टेयर भूमि
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चिराईपानी गांव: 9 किसानों की लगभग 6.88 हेक्टेयर भूमि
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कोकड़ीतराई गांव: 12 किसानों की लगभग 1.55 हेक्टेयर भूमि
कुल मिलाकर 351 खसरा नंबर की जमीन को जलाशय निर्माण और पानी के संग्रह के लिए अधिग्रहित किया गया।
इस अधिग्रहण का उद्देश्य जलाशय के माध्यम से कृषि और स्थानीय जीवन के लिए पानी संग्रह करना और क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा देना था।
अवैध कब्जा कराने वालों ने कोकड़ीतराई जलाशय की जमीन पर बस्ती बसा ली है। बाहर से रायगढ़ आए परिवारों को रुपए लेकर जमीन पर मकान बनाने की अनुमति दी गई। किस भूमाफिया ने ऐसा किया है, इसकी जांच भी प्रशासन नहीं कर रहा है। रायगढ़ जिले का मतलब केवल रायगढ़ शहर हो गया है। कोकड़ीतराई जलाशय के लिए जमीन का अधिग्रहण 1978 में हो चुका है। चार गांवों की करीब 73 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण किया गया था।
अधिग्रहित भूमि को भी शासन बचाने में नाकाम रहा। जल संसाधन विभाग के इस प्रोजेक्ट के लिए कोकड़ीतराई के 12 किसानों की 1.549 हे., चिराईपानी की 9 किसानों की 6.880 हे., उच्चभिट्ठी की 46 किसानों की 31.171 हे. और परसदा के 41 किसानों की 32.858 हे. कुल 72.455 हे. भूमि का अधिग्रहण किया था। 351 खसरा नंबरों की जमीन का अर्जन हुआ था।राजस्व विभाग को सभी खसरा नंबरों को जल संसाधन विभाग के नाम पर चढ़ाते हुए अतिक्रमण को रोकना था। स्थानीय जनप्रतिनिधि भी अतिक्रमण रोकलने के बजाय इसे बढ़ावा देने में जुटे रहे।
50 से ज्यादा खसरा नंबरों को जल संसाधन विभाग के नाम पर नहीं चढ़ाया गया। इस जमीन पर पुराने मालिकों ने राखड़ पाटकर दूसरे लोगों को बेच दिया। उच्चभिट्ठी ग्राम पंचायत की ओर से जलाशय की ओर अतिक्रमण बढ़ता ही जा रहा है। आसपास के उद्योगों से हजारों टन फ्लाई एश लाकर डाला गया। तब भी राजस्व विभाग ने इसकी रिपोर्ट नहीं दी। पटवारी और आरआई को सब कुछ मालूम होते हुए भी इसकी सूचना नहीं दी गई।

बस्ती बस गई, किसी को खबर नहीं
कोकड़ीतराई जलाशय का वो भाग जो उच्चभिट्ठी पंचायत से लगा है, वहीं अतिक्रमण हो रहा है। राखड़ अभी भी पाटा जा रहा है। एक पूरी बस्ती इस पर बसाई जा चुकी है। कुछ महीने पहले एसडीओ जल संसाधन ने रिकॉर्ड दुरुस्त करने के लिए पत्राचार किया था। जो जमीन बिक चुकी है, उस पर विभाग को कैसे आधिपत्य मिलेगा। अभी भी अवैध कब्जे हो रहे हैं।
अतिक्रमण का बढ़ता स्तर
समय के साथ, जलाशय के आसपास की भूमि पर अतिक्रमण बढ़ता गया। खासकर उच्चभिट्ठी ग्राम पंचायत से जुड़ी जमीन पर बाहरी लोगों ने कब्जा कर लिया।
अतिक्रमण के कारण और प्रकार:
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बाहरी लोग और भू-माफिया: सरकारी रिकॉर्ड की कमजोरी का फायदा उठाकर बड़ी संख्या में बाहर से लोग आए और जमीन कब्जा की।
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कागज़ों में गलत रिकॉर्ड: राजस्व विभाग ने 50 से अधिक खसरा नंबरों को जल संसाधन विभाग के नाम से अपडेट नहीं किया।
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भूमि का अवैध बंटवारा: पुराने मालिकों ने जमीन को दूसरों को बेच दिया, जिससे कब्जा और भी जटिल हो गया।
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उद्योगों का दखल: आसपास के उद्योगों ने हजारों टन अपशिष्ट (फ्लाई ऐश) भरकर जमीन को कमजोर किया।
इन कारणों से अतिक्रमण सिर्फ रुका नहीं, बल्कि तेजी से बढ़ा।
रिकॉर्ड दुरुस्त न होने की समस्या
सरकारी रिकॉर्ड में सुधार न होना समस्या को और जटिल बना रहा है।
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खसरा रिकॉर्ड में बदलाव न होना: अधिग्रहित जमीन के खसरा नंबर अपडेट नहीं किए गए।
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विभागीय निष्क्रियता: जब पटवारी और राजस्व निरीक्षक स्थिति से वाकिफ़ थे, तब भी रिकॉर्ड में सुधार नहीं हुआ।
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गलत बिक्री: लोगों ने गलत रिकॉर्ड की जमीन खरीद ली और कब्जा कर लिया।
यह स्थिति दर्शाती है कि रिकॉर्ड की गुणवत्ता और समय पर सुधार ही भूमि संरक्षण में सबसे अहम कारक हैं।
बस्तियों का विकास और प्रशासनिक निष्क्रियता
अतिक्रमण बढ़ते-बढ़ते अब पूरी बस्ती का रूप ले चुका है।
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सरकारी स्तर पर कुछ पत्राचार हुआ, जैसे एसडीओ जल संसाधन ने रिकॉर्ड सुधारने के लिए पत्र भेजा, लेकिन जमीन पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
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जमीन, जो पहले अधिगृहित थी, अब कई लोगों के नाम में बिक चुकी है।
परिणामस्वरूप अतिक्रमण रोकना कठिन हो गया है और प्रशासन के लिए वास्तविक अधिकार साबित करना चुनौती बन गया है।
समस्याओं के गहरे प्रभाव
जलाशय की जमीन पर अतिक्रमण के व्यापक प्रभाव हैं:
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पानी संग्रह क्षमता घटना: जलाशय का क्षेत्र घटने से पानी संग्रहण की क्षमता कम होगी।
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कृषि प्रभावित होना: जलाशय से सिंचाई प्रभावित होगी, जिससे स्थानीय कृषि को नुकसान होगा।
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पर्यावरणीय संकट: मिट्टी का कटाव, बाढ़ की संभावना और पारिस्थितिक असंतुलन बढ़ेंगे।
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सामाजिक और आर्थिक प्रभाव: स्थानीय समुदायों का जीवन प्रभावित होगा, खासकर वे लोग जो जमीन पर सीधे निर्भर हैं।
यदि इसे तुरंत नहीं रोका गया, तो स्थिति और गंभीर हो सकती है।
अधिकारी और प्रशासन की भूमिका
अधिकारी और प्रशासन की निष्क्रियता इस समस्या को बढ़ाने में मुख्य कारण है।
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राजस्व विभाग को खसरा रिकॉर्ड सुनिश्चित करना चाहिए था।
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अतिक्रमण होते ही कार्रवाई करनी चाहिए थी।
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कुछ स्थानीय जनप्रतिनिधि भी अतिक्रमण को रोकने के बजाय उसे बढ़ावा देते दिखाई दिए।
इस प्रकार, प्रशासनिक निष्क्रियता और भ्रष्टाचार अतिक्रमण को बढ़ावा देते हैं।
जनता का दृष्टिकोण
स्थानीय लोग और समुदाय अतिक्रमण से परेशान हैं।
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कृषि योग्य जमीन अब बस्तियों में बदल रही है।
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जलाशय का क्षेत्र घटने से पानी की समस्या बढ़ रही है।
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प्रशासनिक निष्क्रियता से जनता का विश्वास कमजोर हुआ है।
स्थानीय लोग चाहते हैं कि भू-माफिया के खिलाफ तुरंत कार्रवाई हो और जमीन को वास्तविक अधिकारियों को लौटाया जाए। Kelo Pravah
समाधान और सुझाव
जलाशय की जमीन पर अतिक्रमण रोकने और उसे संरक्षित करने के लिए कई कदम उठाए जा सकते हैं:
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रिकॉर्ड का सत्यापन और सुधार: खसरा रिकॉर्ड तुरंत दुरुस्त किया जाए। डिजिटल रिकॉर्डिंग और GIS आधारित नक्शों का उपयोग किया जाए।
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प्रशासनिक जवाबदेही: निष्क्रिय अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।
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कानूनी प्रक्रिया का पालन: अतिक्रमण के खिलाफ सख्त कानूनी कदम उठाए जाएं।
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समुदाय की भागीदारी: स्थानीय समुदाय को जागरूक किया जाए ताकि वे अपने जल संसाधन और जमीन का संरक्षण कर सकें।
इन उपायों से ही जलाशयों और अन्य सार्वजनिक भूमि की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।
कोकड़ीतराई जलाशय की जमीन पर अतिक्रमण सिर्फ स्थानीय समस्या नहीं है। यह रिकॉर्ड की गुणवत्ता, प्रशासनिक जवाबदेही और भूमि संरक्षण की जटिल समस्याओं का प्रतिनिधित्व करता है।
यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो अतिक्रमण बढ़ता रहेगा और जलाशयों, कृषि और पारिस्थितिक संतुलन को गंभीर नुकसान पहुंचेगा।
पारदर्शिता, जवाबदेही, तकनीकी सुधार और स्थानीय सहभागिता के माध्यम से ही इस समस्या का समाधान संभव है।
हम सभी को यह समझना चाहिए कि भूमि संरक्षण केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह समाज की भी जिम्मेदारी है।
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