छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने गायों की मौतों पर सरकार को लगाई फटकार

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने गायों की मौतों पर मांगा नया हलफ़नामा, पशु संरक्षण पर उठे गंभीर सवाल

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने राज्य में गौशालाओं में भूख और प्यास से हो रही गायों की मौतों पर कड़ी नाराज़गी जताई है।
न्यायालय ने सरकार की ओर से दाखिल किए गए पुराने हलफ़नामे को “अपर्याप्त और गैर-गंभीर” बताते हुए नया विस्तृत हलफ़नामा पेश करने का आदेश दिया है।
न्यायालय ने कहा कि “गौशालाओं में यदि मूलभूत सुविधाएँ ही नहीं हैं, तो यह न केवल प्रशासनिक विफलता बल्कि मानवीय संवेदनाओं का भी अपमान है।”

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने गायों के भूख-प्यास से होने वाली मौतों पर राज्य को फटकार लगाई, नई हलफनामा माँगा। The Times of India


मामले की पृष्ठभूमि

पिछले कुछ महीनों में छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों — जैसे महासमुंद, बलौदाबाज़ार, रायगढ़, और कवर्धा — से दर्जनों गायों की मौत की घटनाएँ सामने आईं।
कई रिपोर्टों में बताया गया कि कई गौशालाओं में

  • चारे और पानी की भारी कमी थी,

  • देखरेख करने वाले कर्मचारियों की अनुपस्थिति थी,

  • और पशु चिकित्सकों की तैनाती भी नहीं की गई थी।

इन घटनाओं को देखते हुए सामाजिक कार्यकर्ता और गौसेवा संगठनों ने याचिका दायर की थी, जिसमें राज्य सरकार की जवाबदेही तय करने की मांग की गई थी।


न्यायालय में सुनवाई का विवरण

सुनवाई मुख्य न्यायाधीश आर. रमेश कुमार और न्यायमूर्ति वी. के. शर्मा की खंडपीठ में हुई।
राज्य सरकार की ओर से दाखिल जवाब में कहा गया था कि

“गौशालाओं में आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध हैं और कुछ घटनाएँ प्राकृतिक कारणों से हुईं।”

इस पर न्यायालय ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा —

“यदि गौशालाओं में जानवर भूख-प्यास से मर रहे हैं, तो यह किसी प्राकृतिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बल्कि गंभीर लापरवाही है। राज्य सरकार की यह जिम्मेदारी है कि वह उन जीवों की रक्षा करे जिन्हें ‘गौमाता’ कहा जाता है।”


अदालत की सख्त टिप्पणियाँ

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि —

  1. “राज्य के प्रत्येक जिले में गौशालाओं की वास्तविक स्थिति का आकलन ज़मीनी स्तर पर होना चाहिए।”

  2. “केवल कागज़ों पर योजनाएँ बनाकर या फाइलों में रिपोर्ट जमा करना पर्याप्त नहीं है।”

  3. “गौशालाओं को संचालित करने वाले एनजीओ और समितियों की नियमित मॉनिटरिंग आवश्यक है।”

  4. “अगर आने वाले हफ्तों में सुधार नहीं हुआ तो अदालत स्वतः संज्ञान लेकर सख्त कार्रवाई करेगी।”

न्यायालय ने यह भी पूछा कि सरकार ने पिछले बजट में जो पशु कल्याण कोष (Cattle Welfare Fund) घोषित किया था, उसका उपयोग कैसे हुआ?


नया हलफ़नामा दाख़िल करने का आदेश

अदालत ने राज्य को 10 दिनों के भीतर नया विस्तृत हलफ़नामा दाख़िल करने का निर्देश दिया है, जिसमें निम्नलिखित बिंदुओं की जानकारी मांगी गई है —

  • प्रत्येक जिले में कुल गौशालाओं की संख्या।

  • उनमें रह रही गायों की संख्या।

  • भोजन, पानी और चिकित्सीय सुविधाओं की व्यवस्था।

  • मृत गायों के पोस्टमार्टम और रिपोर्ट की जानकारी।

  • ज़िम्मेदार अधिकारियों के नाम और कार्रवाई का विवरण।

साथ ही अदालत ने कहा कि राज्य को यह भी बताना होगा कि “भविष्य में ऐसी घटनाएँ रोकने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जा रहे हैं।”


राज्य सरकार की प्रतिक्रिया

राज्य के पशुपालन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि —

“हम अदालत के निर्देशों का सम्मान करते हैं। कई जिलों में तत्काल निरीक्षण दल भेज दिए गए हैं और जहां भी लापरवाही मिली, वहाँ कार्रवाई की जाएगी।”

सरकार ने यह भी दावा किया कि कई गौशालाओं में बारिश और प्राकृतिक परिस्थितियों के कारण चारे की आपूर्ति प्रभावित हुई थी, लेकिन स्थिति पर नियंत्रण पाने के लिए अतिरिक्त बजट आवंटित किया गया है।


गौसेवा संगठनों का आरोप

स्थानीय गौसेवा संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकार की योजनाएँ सिर्फ़ कागज़ों पर हैं।
रायगढ़ और बलौदाबाज़ार क्षेत्रों में कई गौशालाओं में महीनों से राशन की आपूर्ति नहीं हुई।
एक कार्यकर्ता ने कहा —

“गौशालाओं में न तो पानी की टंकी है, न शेड की व्यवस्था। कई जगह गायें खुले मैदान में रह रही हैं। प्रशासन केवल रिपोर्ट भेजकर जिम्मेदारी निभाने का दिखावा कर रहा है।”


जनता और सोशल मीडिया की प्रतिक्रिया

जैसे ही अदालत की फटकार की खबर सोशल मीडिया पर आई, लोगों ने अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की।
ट्विटर (X) और फेसबुक पर #SaveCowsCG, #ChhattisgarhHighCourt, #GaushalaCrisis जैसे हैशटैग ट्रेंड करने लगे।

लोगों ने कहा —

“अगर गौमाता की पूजा की जाती है, तो उनके प्रति संवेदना भी होनी चाहिए।”
“अदालत को सख्त कदम उठाना चाहिए ताकि ऐसी घटनाएँ फिर न हों।”


कानूनी दृष्टिकोण से मामला क्यों अहम है

यह मामला सिर्फ़ एक प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 48 और 51(A)(g) से जुड़ा है —

  • अनुच्छेद 48 कहता है कि राज्य का कर्तव्य है कि वह पशुधन की रक्षा करे।

  • अनुच्छेद 51(A)(g) नागरिकों को जीवों के प्रति करुणा दिखाने का दायित्व देता है।

इसलिए अदालत का रुख़ यह बताता है कि पशु संरक्षण अब केवल नैतिक विषय नहीं, बल्कि कानूनी दायित्व भी है।


राज्य में गौशालाओं की स्थिति

छत्तीसगढ़ में वर्तमान में लगभग 1,900 पंजीकृत गौशालाएँ हैं।
इनमें से कई का संचालन ग्राम पंचायतों या स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा किया जाता है।
हालांकि, कई जगह सुविधाएँ बेहद सीमित हैं —

  • चारे और पानी की कमी

  • चिकित्सक की अनुपलब्धता

  • रखरखाव में बजट की देरी

  • गायों की संख्या अधिक लेकिन जगह सीमित

राज्य सरकार ने पहले “गोधन न्याय योजना” के तहत गोबर खरीदी और पशुपालन सुधार के दावे किए थे, परन्तु ज़मीनी स्थिति अब भी चिंताजनक बताई जा रही है।


पूर्व घटनाओं का हवाला

यह पहला मौका नहीं है जब अदालत ने ऐसी सख़्ती दिखाई हो।
2023 में भी बलौदाबाज़ार जिले में 60 से अधिक गायों की मौत के बाद न्यायालय ने स्वतः संज्ञान लिया था।
तब भी प्रशासन ने “प्राकृतिक कारण” बताकर मामला बंद करने की कोशिश की थी।

अब दोबारा वही हालात सामने आने से अदालत ने नाराज़गी जताई है कि “राज्य ने पिछले आदेशों को गंभीरता से नहीं लिया।”


पशु अधिकार कार्यकर्ताओं की मांगें

कार्यकर्ताओं ने अदालत से अनुरोध किया है कि —

  1. राज्य स्तरीय मॉनिटरिंग कमेटी बनाई जाए।

  2. प्रत्येक जिले में गौशालाओं का मासिक निरीक्षण अनिवार्य किया जाए।

  3. चारे-पानी की आपूर्ति की ऑनलाइन ट्रैकिंग व्यवस्था हो।

  4. लापरवाही पर अधिकारी निलंबन और जुर्माने का प्रावधान लागू हो।

उनका मानना है कि जब तक जवाबदेही तय नहीं की जाएगी, तब तक स्थिति नहीं सुधरेगी।


संवेदना और सामाजिक पहलू

गाय भारतीय संस्कृति में आस्था और कृषि दोनों की प्रतीक रही है।
लेकिन यदि वही गायें भूख-प्यास से मरती हैं, तो यह समाज की असंवेदनशीलता का दर्पण बन जाता है।
छत्तीसगढ़ जैसे कृषि प्रधान राज्य में गायें ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं —
उनसे दूध, खाद, और कृषि कार्यों में सीधा योगदान जुड़ा है।

अदालत की यह फटकार इस ओर संकेत करती है कि पशु संरक्षण केवल धार्मिक भावना नहीं, बल्कि विकास और संवेदना दोनों का प्रश्न है।


आगे की राह

अदालत ने यह स्पष्ट किया है कि अगली सुनवाई में यदि संतोषजनक रिपोर्ट नहीं आई, तो वह

  • स्वतः जांच दल गठित कर सकती है,

  • और संबंधित अधिकारियों पर कार्रवाई का आदेश भी दे सकती है।

राज्य सरकार के लिए यह अब केवल “जवाब देने” का नहीं, बल्कि वास्तविक सुधार दिखाने का मौका है।
सकारात्मक पहलुओं में यह बात भी सामने आई है कि कुछ जिलों — जैसे दुर्ग और कोरिया — में स्थानीय समितियों ने अपनी गौशालाओं की स्थिति में सुधार किया है।

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय का यह कदम न केवल पशु कल्याण की दिशा में एक चेतावनी है, बल्कि यह भी याद दिलाता है कि शासन की जिम्मेदारी केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं।
गायें हमारे समाज की भावनाओं, कृषि व्यवस्था और पर्यावरणीय संतुलन से जुड़ी हैं।

राज्य सरकार को अब यह सिद्ध करना होगा कि वह केवल योजनाओं और रिपोर्टों तक सीमित नहीं है, बल्कि वास्तव में “गौसेवा” के अर्थ को समझती है।
यदि अदालत की चेतावनी को गंभीरता से लिया गया, तो यह छत्तीसगढ़ में गौशालाओं के पुनर्गठन और पशु कल्याण सुधारों की दिशा में ऐतिहासिक मोड़ साबित हो सकता है।

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