Site icon City Times Raigarh

रायगढ़(2025) में ग्रामीणों का कोयला खनन परियोजना के खिलाफ विरोध पर्यावरण और आजीविका की लड़ाई

रायगढ़ में कोयला खनन परियोजना के खिलाफ ग्रामीणों का विरोध पर्यावरण और आजीविका की लड़ाई

छत्तीसगढ़ का रायगढ़ जिला, जिसे राज्य का औद्योगिक हृदय कहा जाता है, एक बार फिर चर्चा में है। इस बार वजह है — यहां प्रस्तावित कोयला खनन परियोजना के खिलाफ स्थानीय ग्रामीणों का ज़ोरदार विरोध। गाँव के लोग, विशेष रूप से आदिवासी समुदाय, इस परियोजना को अपनी जमीन, जंगल और जल स्रोतों के लिए खतरा मान रहे हैं।

यह विरोध केवल एक परियोजना के खिलाफ नहीं, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा, जीवनशैली के अधिकार और पर्यावरणीय संतुलन की लड़ाई बन चुका है।


रायगढ़ जिले के अंतर्गत आने वाले कई ग्रामों — जैसे कि गारे-पेल्मा, तमनार, सरगांव, और डोंगरीपाली क्षेत्रों में कोयला खदानों का विस्तार प्रस्तावित है।
यह परियोजना राज्य सरकार और निजी कंपनियों के संयुक्त उपक्रम के तहत संचालित की जा रही है। रिपोर्टों के अनुसार, यह क्षेत्र कोयले के समृद्ध भंडार वाला है, और सरकार का उद्देश्य बिजली उत्पादन और औद्योगिक उपयोग के लिए कोयले की आपूर्ति बढ़ाना है।

लेकिन स्थानीय निवासियों का कहना है कि इस परियोजना से:


 विरोध की शुरुआत — गांव से कलेक्टोरेट तक आवाज़

विरोध की शुरुआत गांवों से हुई। पहले लोगों ने ग्राम सभाओं में इस परियोजना का विरोध प्रस्ताव पारित किया, लेकिन जब उनकी बात नहीं सुनी गई, तो उन्होंने रायगढ़ कलेक्टोरेट का रुख किया।

ग्रामीणों की मांगें पूरी तरह स्पष्ट हैं —

  1. कोयला खनन परियोजना को तत्काल रोक दिया जाए

  2. भूमि अधिग्रहण से पहले पूर्ण पुनर्वास नीति बनाई जाए।

  3. पर्यावरणीय प्रभाव का सार्वजनिक आकलन (EIA) गांव के लोगों की भागीदारी से किया जाए।

  4. स्थानीय युवाओं को खनन कंपनियों में रोज़गार की गारंटी दी जाए।

  5. प्रदूषण और जल संकट से बचाव के लिए स्वतंत्र निगरानी समिति गठित की जाए।

ग्रामीणों का कहना है कि “विकास” के नाम पर यदि उनकी जमीन, हवा और पानी ही छिन जाए, तो यह विकास नहीं, विनाश है।

ETEnergyworld.com


 पर्यावरणीय प्रभाव — कोयला खनन के छिपे खतरे

रायगढ़ पहले से ही छत्तीसगढ़ के सबसे प्रदूषित जिलों में गिना जाता है।
यहां पहले से ही JSW Steel, Jindal Power, और कई अन्य औद्योगिक इकाइयाँ संचालित हैं। कोयला खनन और थर्मल पावर प्लांट्स ने क्षेत्र की हवा और पानी की गुणवत्ता को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।

नई परियोजना से पर्यावरण पर निम्नलिखित खतरे बढ़ सकते हैं —


 आदिवासी समुदायों की चिंताएँ

रायगढ़ का यह इलाका लंबे समय से आदिवासी और वनवासी समुदायों का निवास स्थान रहा है। उनकी संस्कृति और परंपरा का केंद्र जंगल और जमीन ही हैं।

एक ग्रामीण महिला ने मीडिया से कहा —

“हमारे बच्चे इसी मिट्टी में खेलते हैं, इसी पानी से जीते हैं। अगर यह सब छिन गया, तो हम कहाँ जाएंगे?”

आदिवासी समुदायों के लिए यह परियोजना न केवल आर्थिक हानि, बल्कि सांस्कृतिक विस्थापन का भी कारण बन सकती है। उनके अनुसार, सरकार और कंपनियाँ उन्हें उचित मुआवजा या पुनर्वास की गारंटी नहीं दे रही हैं।


 सरकार और कंपनियों का पक्ष

दूसरी ओर, सरकार और खनन कंपनियाँ इस परियोजना को “विकास की दिशा में कदम” बता रही हैं।
उनका कहना है कि —

सरकारी प्रवक्ता ने कहा है कि “हर प्रभावित परिवार को उचित मुआवजा और पुनर्वास मिलेगा।”
हालाँकि, स्थानीय लोगों का कहना है कि अब तक पिछले प्रोजेक्ट्स में भी ऐसे वादे पूरे नहीं हुए हैं।


 विशेषज्ञों की राय

पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि कोयला खनन परियोजनाएँ जब तक सख्त पर्यावरणीय मानकों के तहत नहीं चलाई जातीं, तब तक ये स्थायी नुकसान पहुंचा सकती हैं।


 संघर्ष और संवाद की राह

यह स्थिति अब संवाद बनाम संघर्ष के बीच झूल रही है।
एक ओर सरकार “विकास” की भाषा बोल रही है, वहीं ग्रामीण “अस्तित्व” की।
अगर दोनों पक्ष बीच का रास्ता नहीं निकालते, तो यह विवाद और गहराता जाएगा।


 विकास तभी जब धरती मुस्कुराए

रायगढ़ का यह आंदोलन हमें एक गहरी सीख देता है —
विकास केवल सड़क, कारखाना और कोयले की गहराई से नहीं मापा जा सकता।
सच्चा विकास वह है जो प्रकृति, समाज और अर्थव्यवस्था के बीच संतुलन बनाए रखे।

आज रायगढ़ के ग्रामीण अपनी ज़मीन के लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के लिए लड़ रहे हैं।
अगर इस लड़ाई को अनसुना किया गया, तो यह केवल एक जिले का नुकसान नहीं, बल्कि पूरी मानवता की हार होगी।

Exit mobile version