सेतु विभाग में 5 बड़े टेंडर विवाद जब पूरा विभाग एक ही ठेकेदार के कब्जे में

सरकारी निर्माण कार्यों में टेंडर प्रक्रिया पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए होती है। इसका मुख्य उद्देश्य है कि अलग‑अलग ठेकेदार प्रतिस्पर्धा करें, उचित मूल्य दें और समय पर गुणवत्ता वाली परियोजना पूरी करें। लेकिन रायगढ़ के सेतु विभाग में हाल ही में एक चिंताजनक मामला सामने आया है।
यहाँ “बैलेंस वर्क” के लिए जारी टेंडर लगातार एक ही ठेकेदार के पास जा रहे हैं, जबकि अन्य ठेकेदारों को एंट्री ही नहीं मिल रही। आरोप हैं कि विभाग में गजब का खेल चल रहा है और पूरा विभाग इस ठेकेदार के कब्जे में है। यह मामला न केवल स्थानीय प्रशासन, बल्कि पूरे सरकारी टेंडर सिस्टम में पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करता है।
बड़े पुलों का निर्माण करने के लिए पीडब्ल्यूडी सेतु विभाग टेंडर जारी करता है। इन दिनों विभाग एक ही ठेकेदार के चंगुल में फंसा हुआ है। पुलों का निर्माण समय पर पूरा नहीं करने वाले ठेकेदार ने अब बैलेंस वर्क के लिए भी सेटिंग की है। सांठगांठ ऐसी है कि किसी भी दूसरे ठेकेदार ने बचे हुए कामों के लिए रेट ही नहीं डाले। सेतु विभाग में किसी भी अफसर से ज्यादा एक ठेकेदार की मर्जी चलती है। उसको कोई ठेका मिलता है तो वह समय पर पूरा नहीं करता।
ठेकेदार को एक्सटेंशन देने में विभाग मेहरबान होता है। यही नहीं टेंडर निरस्त होने के बावजूद बैलेंस वर्क किसी दूसरे को नहीं लेने दिया जाता। पीडब्ल्यूडी सेतु विभाग में ठेकेदार बिशंभर दयाल अग्रवाल को पांच पुलों का ठेका मिला था। सभी ठेके स्वीकृति से 15-20 प्रश बिलो में लिए गए थे। काम पूरा करने की तिथि गुजर गई लेकिन काम पूरा नहीं हुआ। धरमजयगढ़ में रायमेर से ससकोबा मांड नदी पर 6.27 करोड़ में पुल बनाने का ठेका बिशंभर दयाल ने लिया था।
27 जुलाई 2022 को काम पूरा किया जाना था। काम पूरा नहीं हुआ तो टेंडर निरस्त कर दिया गया। 3 दिसंबर 2025 को विभाग ने बैलेंस 70 प्रश वर्क के लिए टेंडर लगाया जिसकी अंतिम तारीख 19 दिसंबर थी। लेकिन एक भी ठेकेदार ने निविदा नहीं डाली। खरसिया में तुरेकेला से तिउर के बीच सपनई नाले में 4.49 करोड़ की लागत से पुल बनाया जाना था जो 7 जनवरी 2023 तक पूरा किया जाना था। यह काम भी अधूरा ही है।
इसका एग्रीमेंट निरस्त कर दिया गया और बाकी काम के लिए टेंडर लगाया गया था। इसमें भी कोई ठेकेदार नहीं पहुंचा। मिली जानकारी के मुताबिक विभाग में सांठगांठ के कारण निविदा प्रक्रिया को बाधित किया जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक दूसरे किसी ठेकेदार को टेंडर डालने से मना किया जा रहा है। पांच सालों तक विभाग छोटे-छोटे पुल भी नहीं बनवा पा रहा है।
और भी कई काम जो नहीं हुए पूरे
विशंभर दयाल अग्रवाल को रायगढ़ जिले में सेतु विभाग के 80 प्रश काम मिले हैं। उसने तेंदुमुड़ी से बेहरामुड़ा धरमजयगढ़ तक 22.63 प्रश बिलो में 6.99 करोड़ में कुरकुट नदी में पुल बनाने का ठेका लिया था। काम 5 फरवरी 2022 तक पूरा हो जाना था। 85 प्रश काम पूरा होने के कारण यह एग्रीमेंट पुनर्जीवित किया गया लेकिन पूरा नहीं हुआ।
नरकालो बायसी मार्ग पर मांड नदी में 10.57 करोड़ की लागत से पुल बनना था जिसकी डेडलाइन 13 अप्रैल 2023 थी। यह काम भी 42 प्रश ही पूरा हो सका। इसका एग्रीमेंट भी निरस्त कर दिया गया है। री-टेंडर का पता नहीं है। बरमकेला के बड़े नवापारा में किंकारी नाला पर पुल निर्माण 9.63 करोड़ की लागत से किया जाना था। 23 जनवरी 2023 तक काम पूरा होना था। 75 प्रश काम पूरा करने के बाद ठेकेदार ने काम बंद कर दिया है। यहां मिट्टी भी खराब गुणवत्ता की डाली गई।
कलेक्टर ने लगाई थी डांट
सूत्रों के मुताबिक पिछले दिनों कलेक्टर मयंक चतुर्वेदी ने सेतु विभाग के लंबित कार्यों की समीक्षा की थी। इसमें काम अधूरे पाए जाने पर ठेकेदार को तलब किया था। उन्होंने समय पर काम पूरा नहीं करने के कारण ठेकेदार को डांट भी लगाई थी। विभागीय अधिकारियों को भी काम पूरा नहीं करवा पाने पर फटकार मिली है। विशंभर दयाल ने बड़े नवापारा पुल को लेकर हाईकोर्ट में याचिका लगाई थी। अदालत ने याचिका खारिज कर दी है। बताया जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई है।
क्या कहते हैं भगत
बैलेंस वर्क के लिए टेंडर लगाए गए थे लेकिन कोई ठेकेदार नहीं आया। मुख्यालय से जैसा आदेश होगा करेंगे।
– संतोष भगत, ईई, सेतु पीडब्ल्यूडी
बड़े पुलों के लिए टेंडर
सेतु विभाग ने कई बड़े पुलों के निर्माण के लिए टेंडर जारी किए। इनमें से अधिकांश टेंडर बिशंभर दयाल अग्रवाल को दिए गए, जिनके पास विभाग के लगभग 80 प्रोजेक्ट्स हैं।
कुछ प्रमुख उदाहरण हैं:
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धरमजयगढ़ में रायमेर – सासकोबा मांड नदी पर पुल का ठेका 6.27 करोड़ रुपये में लिया गया।
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खरसिया – सपनई नाले में पुल का काम 4.49 करोड़ रुपये में था।
अधूरे कार्य के बावजूद ठेकेदार को लाभ
इन प्रोजेक्ट्स की समय सीमा समाप्त हो चुकी थी, लेकिन विभाग ने बिना सख्ती के टेंडर को निरस्त नहीं किया। अब बैलेंस वर्क के लिए री‑टेंडर जारी किया जा रहा है।
टेंडर में भाग लेने वाला कोई नहीं
हाल ही में विभाग ने बाकी बचे कार्य के लिए नया टेंडर निकाला, लेकिन कोई भी दूसरा ठेकेदार इसमें हिस्सा नहीं ले रहा। यही वजह है कि आरोप हैं कि प्रक्रिया में पारदर्शिता नहीं है और केवल “चहेते” ठेकेदार को ही फायदा हो रहा है।
समस्या की गंभीरता

प्रतिस्पर्धा का अभाव
जब लगातार एक ही ठेकेदार टेंडर जीतता है, तो प्रतिस्पर्धा खत्म हो जाती है। इससे परियोजनाओं में गुणवत्ता की कमी और समय पर काम पूरा न होने का खतरा बढ़ जाता है।
पारदर्शिता का अभाव
सरकारी टेंडर का उद्देश्य है निष्पक्ष और स्पष्ट प्रक्रिया, लेकिन दूसरे ठेकेदारों को एंट्री न मिलने से पारदर्शिता खतरे में पड़ जाती है।
सरकारी धन का दुरुपयोग
एक ही ठेकेदार के पास कई प्रोजेक्ट्स होने से सरकारी धन के सही उपयोग पर सवाल उठते हैं। अधूरे काम के बावजूद ठेकेदार को लाभ मिलना भ्रष्टाचार के संकेत देता है।
समय पर परियोजना न पूरी होना
जो पुल समय पर पूरा नहीं हुआ, उसी ठेकेदार को आगे के टेंडर में शामिल करना विभाग की जवाबदेही पर सवाल खड़ा करता है।
अधिकारियों की भूमिका
जब इस मामले पर सवाल उठाए गए, तो विभाग के वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि टेंडर के लिए मुख्यालय से आदेश आए हैं और वे उसी के अनुसार काम कर रहे हैं।
यह जवाब कई सवाल छोड़ता है:
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क्या विभाग खुद निष्पक्ष निर्णय ले सकता है?
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अगर मुख्यालय के आदेश पर काम हो रहा है, तो वहां भी पारदर्शिता है या नहीं?
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क्या ठेकेदार की क्षमता और अतीत का रिकॉर्ड सही तरीके से आंकला गया?
इन सभी सवालों का जवाब स्पष्ट नहीं है, जिससे लोगों में चिंता बढ़ रही है।
कलेक्टर की समीक्षा
कलेक्टर ने विभाग के लंबित कार्यों की समीक्षा की थी और अधूरे कार्यों के लिए ठेकेदार को तलब किया। अधिकारियों को फटकार भी लगाई गई। यह दर्शाता है कि स्थानीय प्रशासन मामले से चिंतित है, लेकिन ठोस कार्रवाई नहीं हो पाई है।
समस्या केवल रायगढ़ तक सीमित नहीं
देश भर में ऐसी शिकायतें समय‑समय पर सामने आती रही हैं, जहाँ टेंडर कुछ “पसंदीदा” ठेकेदारों तक सीमित रहते हैं। ऐसे मामलों में फर्जी अनुभव प्रमाण पत्र और नियम तोड़कर कंपनियों को लाभ दिया जाता है।
टेंडर प्रक्रिया: उद्देश्य और वास्तविकता

सरकारी टेंडर प्रक्रिया का मुख्य उद्देश्य है:
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पारदर्शिता
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निष्पक्षता
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प्रतिस्पर्धा
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गुणवत्ता सुनिश्चित करना
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समय‑बद्ध कार्य पूरा करना
लेकिन वास्तविकता में:
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चहेते ठेकेदार को ही लाभ मिलता है
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अनुभव और योग्यता का मनमाना आंकलन होता है
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अधूरे कामों के बावजूद आगे के प्रोजेक्ट्स दिए जाते हैं
क्यों दूसरे ठेकेदार टेंडर में नहीं भाग ले पा रहे?
1. समझौते जैसा माहौल
कुछ आरोपों के अनुसार विभाग और ठेकेदार के बीच पहले से समझौता होता है, जिससे अन्य ठेकेदारों को मौका नहीं मिलता।Kelo Pravah
2. योग्यता की अनावश्यक शर्तें
कई बार टेंडर में ऐसी शर्तें रखी जाती हैं, जिन्हें सामान्य ठेकेदार पूरा नहीं कर सकते।
3. फर्जी अनुभव प्रमाण पत्र
कुछ मामलों में फर्जी अनुभव प्रमाण पत्र दिखाकर ठेकेदार को प्रोजेक्ट दिया जाता है।
सिस्टम में सुधार के सुझाव
सख्त निगरानी और पारदर्शिता
टेंडर प्रक्रिया को पूरी तरह ऑनलाइन और खुला रखना चाहिए ताकि हर योग्य ठेकेदार भाग ले सके।
अनुभव और योग्यता की स्वतंत्र जांच
अनुभव प्रमाण पत्र और कंपनी रिकॉर्ड की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।
समय सीमा का पालन
जो ठेकेदार काम समय पर पूरा नहीं करता, उसे आगे के प्रोजेक्ट्स की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए।
स्वतंत्र ऑडिट और निगरानी संस्था
एक स्वतंत्र संस्था प्रत्येक टेंडर और कार्य की समीक्षा करे ताकि भ्रष्ट गतिविधियों पर नजर रहे।
रायगढ़ का यह मामला केवल एक ठेकेदार का विवाद नहीं है, बल्कि यह पूरे सरकारी टेंडर सिस्टम की समस्या को उजागर करता है।
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एक ही ठेकेदार के पास कई प्रोजेक्ट्स
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अधूरे काम के बावजूद लाभ
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अन्य ठेकेदारों के लिए एंट्री बंद
ये सभी संकेत हैं कि सिस्टम में सुधार की आवश्यकता है।
देश में ऐसे मामले समय‑समय पर सामने आते रहे हैं। इसलिए जरूरी है कि प्रशासन, अधिकारियों और नागरिक मिलकर पारदर्शिता, निष्पक्षता और गुणवत्ता सुनिश्चित करें।
जनता की भूमिका
यदि आप इस प्रकार के भ्रष्टाचार या गड़बड़ी को देखते हैं:
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स्थानीय प्रशासन को सूचित करें
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मीडिया में मामले को उजागर करें
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जनहित याचिका (PIL) के माध्यम से आवाज उठाएं
सभी की सक्रिय भागीदारी से ही सरकारी परियोजनाओं में सुधार और सही दिशा सुनिश्चित की जा सकती है।
इस लेख का उद्देश्य है लोगों को जागरूक करना और पारदर्शी सरकारी प्रणाली की जरूरत को उजागर करना।
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