“7 चौंकाने वाली वजहें बंटवारा और सीमांकन के प्रकरण भी नहीं निपटा पा रहे अधिकारी”

7 चौंकाने वाली वजहें बंटवारा और सीमांकन के प्रकरण नहीं निपटा पा रहे अधिकारी वर्षों से न्याय की राह देख रहे ग्रामीण

राज्य के ग्रामीण और अर्धशहरी इलाकों में जमीन से जुड़े विवाद आज भी सबसे बड़ी प्रशासनिक समस्या बने हुए हैं। खासतौर पर बंटवारा (पारिवारिक भूमि विभाजन) और सीमांकन (जमीन की वास्तविक सीमा निर्धारण) जैसे प्रकरणों में आम नागरिकों को वर्षों तक सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि ये दोनों प्रक्रियाएं राजस्व विभाग की नियमित और प्राथमिक जिम्मेदारियों में शामिल हैं, इसके बावजूद अधिकारी इन्हें समय पर निपटाने में असफल साबित हो रहे हैं।

यह स्थिति न केवल प्रशासनिक अक्षमता को उजागर करती है, बल्कि आम लोगों के जीवन, कृषि, निवेश और सामाजिक शांति पर भी गहरा असर डाल रही है।

राजस्व न्यायालयों में मूल काम ही अटक रहे हैं। कभी अधिकारी नहीं रहते तो कभी कोई कार्यक्रम आ जाता है। कभी कोई बैठक तो कभी किसी वीआईपी का दौरा। राजस्व न्यायालयों में सीमांकन और बंटवारा के प्रकरण भी कई पेशियों तक   चलते रहते हैं। नवंबर अंत तक की स्थिति देखें तो पता चलेगा कि आधे मामले भी निराकृत नहीं हो सके।

आमतौर पर गांवों में बंटवारा अविवादित ही होता है। भाइयों के बीच आपसी सहमति से पिता संपत्ति का बंटवारा करता है। अपवाद स्वरूप कुछ ही मामले विवादित होते हैं। अक्टूबर-नवंबर में जिले में बंटवारे के कुल 162 प्रकरण आए। इनमें से 35 में ही निराकरण हो सका है। 127 लंबित हैं। सामान्य मामले भी कई पेशियों तक लंबा खिंचते चले जाते हैं। The Times of India

इसी तरह सीमांकन के मामलों में भी राजस्व न्यायालय पिछड़ रहे हैं। लोक सेवा गारंटी के नियमों का पालन ही नहीं हो रहा है। पिछले दो महीनों में जिले में 463 सीमांकन के प्रकरण दर्ज किए गए। इनमें से 113 निराकृत हुए और 350 लंबित रह गए। सबसे ज्यादा मामले तमनार तहसील में सामने आए हैं। यहां 327 सीमांकन के प्रकरण दर्ज किए गए थे जिसमें से 101 का निराकरण हो सका और 226 लंबित हैं।

कोयला धारित क्षेत्रों में बंटवारे
कोल ब्लॉक क्षेत्रों में मुआवजा प्राप्त करने के लिए परिवार में ही आपसी टकराव होने लगता है। छोटे टुकड़ों की जमीन का मुआवजा ज्यादा मिलता है। इसलिए अब भूमि के बंटवारे भी तेजी से हो रहे हैं। घरघोड़ा और तमनार में सीमांकन-बंटवारे के प्रकरण अन्य तहसीलों से अधिक हैं।


क्या है बंटवारा और सीमांकन?

बंटवारा (Partition)

बंटवारा वह प्रक्रिया है जिसमें पैतृक या संयुक्त भूमि को परिवार के सदस्यों के बीच कानूनी रूप से विभाजित किया जाता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि प्रत्येक हिस्सेदार को उसका निर्धारित भाग मिले और भविष्य में विवाद की स्थिति न बने।

सीमांकन (Demarcation)

सीमांकन के तहत जमीन की वास्तविक भौगोलिक सीमा तय की जाती है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि कौन-सी भूमि किसके स्वामित्व में है। खेती, निर्माण, बिक्री या सरकारी मुआवजे के लिए सीमांकन बेहद जरूरी प्रक्रिया है।


समस्या की जड़: क्यों नहीं निपट रहे प्रकरण?

1. अधिकारियों की उदासीनता

ग्रामीण क्षेत्रों से लगातार शिकायतें सामने आ रही हैं कि तहसील और राजस्व कार्यालयों में बंटवारा व सीमांकन के आवेदन महीनों तक फाइलों में दबे रहते हैं। कई मामलों में तो वर्षों तक कोई सुनवाई नहीं होती।

2. कर्मचारियों की भारी कमी

राजस्व विभाग में पटवारियों, राजस्व निरीक्षकों और नायब तहसीलदारों की संख्या जरूरत से कहीं कम है। एक ही अधिकारी पर कई गांवों का भार होने से समय पर कार्यवाही संभव नहीं हो पाती।

3. मैनुअल प्रक्रिया और तकनीकी पिछड़ापन

आज भी कई जगहों पर भूमि रिकॉर्ड पूरी तरह डिजिटाइज नहीं हैं। पुराने नक्शे, हाथ से लिखी खतौनी और रिकॉर्ड की अस्पष्टता सीमांकन को और जटिल बना देती है।

4. भ्रष्टाचार के आरोप

कई नागरिकों का आरोप है कि बिना ‘अतिरिक्त खर्च’ के बंटवारा या सीमांकन कराना लगभग असंभव हो गया है। इससे ईमानदार आवेदक हतोत्साहित होते हैं और प्रकरण जानबूझकर लटकाए जाते हैं।


ग्रामीणों पर इसका सीधा असर

1. खेती प्रभावित

सीमांकन न होने से किसान यह तय नहीं कर पाते कि वे किस भूमि पर खेती करें। कई बार विवाद के डर से जमीन खाली पड़ी रह जाती है।

2. पारिवारिक विवाद और तनाव

बंटवारा न होने से परिवारों में कलह बढ़ती है। भाई-भाई के बीच विवाद कोर्ट तक पहुंच जाते हैं, जिससे सामाजिक ताना-बाना कमजोर होता है।

3. निवेश और विकास में रुकावट

भूमि स्पष्ट न होने के कारण लोग न तो मकान बना पाते हैं और न ही जमीन बेच या गिरवी रख पाते हैं। इससे ग्रामीण विकास की गति धीमी हो जाती है।

4. न्यायालयों पर बढ़ता बोझ

प्रशासनिक स्तर पर न सुलझने वाले ये मामले अंततः सिविल कोर्ट में पहुंच जाते हैं, जहां वर्षों तक सुनवाई चलती रहती है।


कानून क्या कहता है?

राज्य के भू-राजस्व संहिता के तहत बंटवारा और सीमांकन के मामलों को निर्धारित समय-सीमा में निपटाने का प्रावधान है। नियमों के अनुसार:

  • सीमांकन आवेदन पर तय समय में स्थल निरीक्षण होना चाहिए

  • बंटवारा प्रकरण में सभी पक्षों को सुनवाई का अवसर मिलना चाहिए

  • अनावश्यक विलंब अधिकारी की जवाबदेही तय करता है

इसके बावजूद व्यवहार में इन नियमों का पालन शायद ही होता दिख रहा है।


प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब जमीन से जुड़े ये मामले आम जनता के जीवन से सीधे जुड़े हैं, तो इन्हें प्राथमिकता क्यों नहीं दी जाती? कई तहसीलों में अधिकारी बदलते रहते हैं, लेकिन लंबित प्रकरण जस के तस बने रहते हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि शिकायत करने पर भी उन्हें सिर्फ आश्वासन ही मिलता है, समाधान नहीं।


डिजिटल इंडिया के दावे और जमीनी हकीकत

सरकार एक ओर डिजिटल लैंड रिकॉर्ड, ऑनलाइन आवेदन और ई-गवर्नेंस की बात करती है, वहीं दूसरी ओर गांवों में आज भी सीमांकन के लिए पटवारी की उपलब्धता सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है।

कई बार ऑनलाइन आवेदन करने के बाद भी फाइल को आगे बढ़ाने के लिए आवेदक को व्यक्तिगत रूप से कार्यालय जाना पड़ता है।


समाधान क्या हो सकता है?

1. समय-सीमा तय कर सख्ती से पालन

हर बंटवारा और सीमांकन प्रकरण के लिए स्पष्ट समय-सीमा तय हो और उल्लंघन पर संबंधित अधिकारी की जवाबदेही तय की जाए।

2. कर्मचारियों की नियुक्ति

पटवारियों और राजस्व अमले की भर्ती कर कार्यभार को संतुलित किया जाए।

3. पूर्ण डिजिटल रिकॉर्ड

भूमि नक्शों और रिकॉर्ड का पूर्ण डिजिटलीकरण कर सीमांकन को तकनीकी रूप से आसान बनाया जाए।

4. निगरानी तंत्र

जिला स्तर पर लंबित प्रकरणों की नियमित समीक्षा हो और उच्च अधिकारी सीधे निगरानी करें।

5. भ्रष्टाचार पर सख्त कार्रवाई

शिकायत मिलने पर त्वरित जांच और दोषियों पर कार्रवाई से आम जनता का भरोसा बहाल किया जा सकता है।


जनप्रतिनिधियों की भूमिका

स्थानीय विधायक, सांसद और पंचायत प्रतिनिधि यदि इन मुद्दों को गंभीरता से उठाएं, तो प्रशासन पर दबाव बन सकता है। भूमि विवाद केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक विकास से जुड़ा विषय है।

बंटवारा और सीमांकन जैसे बुनियादी राजस्व कार्यों का समय पर न होना प्रशासनिक विफलता का स्पष्ट संकेत है। जब तक इन मामलों को गंभीरता से लेकर समाधान नहीं किया जाएगा, तब तक ग्रामीणों को न तो न्याय मिलेगा और न ही विकास की गति तेज हो पाएगी।

अब जरूरत है कि प्रशासन कागजी दावों से बाहर निकलकर जमीनी स्तर पर प्रभावी कार्रवाई करे, ताकि वर्षों से लंबित पड़े बंटवारा और सीमांकन के प्रकरणों का निष्पक्ष और त्वरित निपटारा हो सके।

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