आधी अवधि बीतने पर भी धान खरीदी अधूरी, केवल 1 तिहाई किसान ही बेच सके फसल

धान खरीदी के आधे दिन खत्म, केवल 1 तिहाई किसान बेच सके धान

व्यवस्था की सुस्ती, किसानों की बढ़ती चिंता और सरकार के सामने खड़े सवाल

छत्तीसगढ़ सहित देश के कई राज्यों में धान खरीदी किसानों की आजीविका का सबसे महत्वपूर्ण आधार मानी जाती है। हर वर्ष सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर किसानों से धान खरीदने का दावा करती है, ताकि किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य मिल सके और वे बिचौलियों के शोषण से बच सकें।

लेकिन मौजूदा खरीफ विपणन वर्ष में स्थिति कुछ अलग ही नजर आ रही है। धान खरीदी की तय अवधि का आधा समय बीत जाने के बावजूद केवल एक तिहाई किसान ही अपना धान बेच पाए हैं। यह आंकड़ा न केवल प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि लाखों किसानों के भविष्य को लेकर गंभीर चिंता भी पैदा करता है।

धान खरीदी का आधा समय खत्म हो चुका है। 26 दिनों की खरीदी पूरी हो चुकी है जबकि 25 दिन बचे हैं। अब तक केवल 33 प्रश किसानों ने ही धान विक्रय किया है जो लक्ष्य का 29 प्रश है। आने वाले दिनों में टोकन और लिमिट नहीं बढ़ाई गई तो किसानों को परेशानी हो सकती है। प्रदेश में समर्थन मूल्य पर धान खरीदी 15 नवंबर से प्रारंभ हो चुकी है।

अब तक 26 दिनों की खरीदी हुई है। जिले में पंजीकृत किसानों की संख्या 83532 है जिसमें से अब तक 27848 ने धान विक्रय किया है। इस बार रायगढ़ जिले में 55.64 लाख क्विंटल धान खरीदी का लक्ष्य तय किया गया है। पिछले साल 50.87 लाख क्विं. धान खरीदा गया था। अब तक की 26 दिनों की धान खरीदी में 16.29 लाख क्विं. धान खरीदा जा चुका है।


धान खरीदी व्यवस्था का संक्षिप्त परिचय

धान खरीदी प्रक्रिया सरकार द्वारा निर्धारित नियमों और समय-सारिणी के अनुसार संचालित की जाती है। इसमें मुख्य रूप से निम्न बिंदु शामिल होते हैं:

  • किसानों का पंजीयन

  • समर्थन मूल्य की घोषणा

  • खरीदी केंद्रों की स्थापना

  • तौल, गुणवत्ता परीक्षण और भुगतान

  • धान का भंडारण और परिवहन

सरकारी दावों के अनुसार यह पूरी प्रक्रिया पारदर्शी, सरल और किसान हितैषी होनी चाहिए, लेकिन जमीनी हकीकत इससे काफी अलग दिखाई दे रही है।

इस लिहाज से देखें तो 33 प्रश किसानों से लक्ष्य का 29 प्रश धान ही खरीदा गया है। अभी भी 55684 किसानों से धान खरीदा जाना बाकी है। वर्तमान में प्रतिदिन करीब 2600 किसानों से 27 हजार क्विंटल धान की खरीदी की जा रही है। बड़े किसानों को तीन टोकन की पात्रता है। धान की मात्रा तो बढ़ी है लेकिन किसानों की संख्या नियंत्रित की गई है।

अब करीब 25 दिन शेष हैं जिसमें कम से कम 45 हजार किसान धान विक्रय करेंगे। टोकन देने का सिस्टम बदलने की वजह से किसानों को थोड़ी दिक्कत हो रही है। अब तक जिले में टोकन तुंहर हाथ एप के जरिए करीब 46 हजार टोकन दिए गए हैं जबकि समिति में मैन्युअली करीब 14 हजार टोकन काटे गए हैं। पिछले साल कुल 73295 किसानों ने धान विक्रय किया था। इस बार धान खरीदी में सख्ती के कारण बोगस खरीदी कम हो रही है।


आधी अवधि बीतने के बाद भी खरीदी अधूरी

इस वर्ष धान खरीदी की शुरुआत समय पर जरूर हुई, लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते गए, समस्याएं सामने आती चली गईं।

  • कई जिलों में खरीदी केंद्र देर से खुले

  • कुछ केंद्रों पर स्टाफ की कमी रही

  • तौल मशीनों की खराबी से काम बाधित हुआ

  • बारदाने (बोरी) की कमी बनी रही

नतीजा यह हुआ कि धान खरीदी के आधे दिन खत्म हो चुके हैं, लेकिन दो तिहाई किसान अब भी अपनी उपज बेचने से वंचित हैं।

14 हजार किसानों ने किया रकबा समर्पण
इस बार खरीदी में पूरा प्रशासनिक अमला लगा हुआ है। प्रत्येक खरीदी केंद्र में तीन स्तर पर नोडल अधिकारी सत्यापन कर रहे हैं। प्रबंधकों को नियंत्रण में रखा गया है। वास्तविक किसानों से ही खरीदी करने के निर्देश हैं। इस बीच करीब 14 हजार किसानों ने 1400 हे. रकबा समर्पित कर दिया है। धान का उत्पादन 21 क्विंटल प्रति एकड़ भी सवालों के घेरे में है। असली घपले की जड़ यही है। इसी वजह से बाहरी धान और रबी का धान खपता है।


आंकड़ों में स्थिति की गंभीरता

यदि कुल पंजीकृत किसानों को 100 प्रतिशत माना जाए, तो अब तक केवल लगभग 33 प्रतिशत किसान ही धान बेच पाए हैं। शेष किसान या तो खरीदी केंद्रों के चक्कर काट रहे हैं या फिर घर पर धान रखकर अनिश्चितता में जी रहे हैं।

यह स्थिति खासतौर पर छोटे और सीमांत किसानों के लिए अधिक कष्टदायक है, जिनके पास भंडारण की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होती।


किसानों की समस्याएं: जमीनी सच्चाई

1. टोकन और स्लॉट की परेशानी

कई किसानों का कहना है कि उन्हें समय पर टोकन नहीं मिल पा रहा है। जिन किसानों को टोकन मिला भी है, उन्हें कई-कई दिन बाद की तारीख दी गई है।

2. खरीदी केंद्रों पर अव्यवस्था

कई जगहों पर खरीदी केंद्रों पर बैठने, पीने के पानी और छाया जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। किसान सुबह से शाम तक लाइन में खड़े रहते हैं।

3. गुणवत्ता के नाम पर धान लौटाया जाना

नमी और गुणवत्ता का हवाला देकर कई किसानों का धान वापस कर दिया जा रहा है। किसान आरोप लगाते हैं कि मापदंडों का दुरुपयोग कर उन्हें परेशान किया जा रहा है।

4. भुगतान में देरी का डर

पिछले वर्षों में भुगतान में देरी के अनुभव के कारण इस बार भी किसान आशंकित हैं कि धान बेचने के बाद पैसा समय पर मिलेगा या नहीं।


छोटे किसानों पर सबसे ज्यादा असर

छोटे किसान जिनके पास 1–2 एकड़ जमीन है, उनके लिए यह स्थिति और भी भयावह है।

  • घर में जगह की कमी

  • कर्ज चुकाने का दबाव

  • अगली फसल की तैयारी की चिंता

इन सभी कारणों से छोटे किसान मानसिक तनाव में हैं। यदि समय पर धान नहीं बिका, तो उन्हें मजबूरी में कम दाम पर व्यापारियों को धान बेचना पड़ सकता है।


प्रशासनिक दावे बनाम हकीकत

प्रशासन का दावा है कि:

  • खरीदी सुचारू रूप से चल रही है

  • सभी किसानों का धान खरीदा जाएगा

  • किसी भी किसान के साथ अन्याय नहीं होगा

लेकिन जमीनी स्तर पर किसान इन दावों से संतुष्ट नहीं दिखते। किसान संगठनों का कहना है कि व्यवस्था और निगरानी दोनों कमजोर हैं।Kelo Pravah


खरीदी केंद्रों की क्षमता पर सवाल

धान खरीदी केंद्रों की संख्या और उनकी दैनिक क्षमता भी एक बड़ा मुद्दा है। कई केंद्रों पर:

  • रोजाना तय क्षमता से अधिक किसान पहुंच जाते हैं

  • तौल की गति बेहद धीमी रहती है

  • एक दिन में गिने-चुने किसानों का ही धान खरीदा जाता है

इससे साफ है कि मौजूदा ढांचा किसानों की संख्या और उत्पादन के अनुपात में अपर्याप्त है।


मौसम और भंडारण की चिंता

धान एक ऐसी फसल है, जिसे सुरक्षित भंडारण की आवश्यकता होती है।

  • अचानक बारिश से धान खराब होने का खतरा

  • नमी बढ़ने पर धान खरीदी से इनकार

  • कीट और फफूंद का प्रकोप

किसान चाहते हैं कि सरकार जल्द से जल्द खरीदी तेज करे, ताकि फसल सुरक्षित रह सके।


किसान संगठनों का आक्रोश

कई किसान संगठनों और सहकारी समितियों ने सरकार और प्रशासन के खिलाफ नाराजगी जाहिर की है।

  • प्रदर्शन और ज्ञापन

  • खरीदी अवधि बढ़ाने की मांग

  • प्रतिदिन खरीदी की सीमा हटाने की मांग

उनका कहना है कि यदि स्थिति नहीं सुधरी, तो आंदोलन का रास्ता अपनाया जाएगा।


सरकार के सामने बड़ी चुनौती

सरकार के लिए यह केवल खरीदी का मुद्दा नहीं, बल्कि विश्वास का प्रश्न भी है।

  • किसानों का भरोसा टूट रहा है

  • राजनीतिक और सामाजिक दबाव बढ़ रहा है

  • ग्रामीण अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही है

यदि समय रहते समाधान नहीं निकाला गया, तो इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं।


संभावित समाधान और सुझाव

1. खरीदी केंद्रों की संख्या बढ़ाई जाए

अतिरिक्त अस्थायी खरीदी केंद्र खोलकर दबाव कम किया जा सकता है।

2. तौल और स्टाफ की व्यवस्था मजबूत हो

अधिक तौल मशीनें और प्रशिक्षित कर्मी लगाए जाएं।

3. खरीदी अवधि बढ़ाई जाए

जो किसान अब तक धान नहीं बेच पाए हैं, उनके लिए समय सीमा बढ़ाना आवश्यक है।

4. पारदर्शिता और निगरानी

प्रत्येक केंद्र पर निगरानी टीम तैनात हो, ताकि मनमानी रोकी जा सके।

5. भुगतान की समयबद्ध व्यवस्था

धान बेचते ही तय समय में भुगतान सुनिश्चित किया जाए।


ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

धान खरीदी में देरी का असर केवल किसानों तक सीमित नहीं रहता।

  • बाजारों में नकदी संकट

  • छोटे व्यापारियों पर असर

  • मजदूरी और रोजगार में कमी

इससे पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी पड़ जाती है।

धान खरीदी के आधे दिन खत्म हो जाने के बावजूद केवल एक तिहाई किसानों का ही धान खरीदा जाना एक गंभीर चेतावनी है। यह स्थिति दर्शाती है कि सरकारी योजनाओं और जमीनी क्रियान्वयन के बीच अब भी बड़ा अंतर है।

यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो किसानों को आर्थिक नुकसान, मानसिक तनाव और असुरक्षा का सामना करना पड़ेगा। सरकार और प्रशासन को चाहिए कि वे किसानों की समस्याओं को गंभीरता से समझें, खरीदी प्रक्रिया में तेजी लाएं और यह सुनिश्चित करें कि हर किसान को उसकी मेहनत का पूरा मूल्य समय पर मिल सके।

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