रायगढ़ कोर्ट का बड़ा फैसला नाबालिग शोषण के आरोपी को 20 साल की जेल

रायगढ़ कोर्ट का बड़ा फैसला नाबालिग की मजबूरी का फायदा उठाने वाला आरोपी अब 20 साल जेल में काटेगा

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले से एक ऐसा मामला सामने आया जिसने पूरे समाज और न्यायपालिका को झकझोर दिया। एक नाबालिग लड़की, जो अपने जीवन में पहले ही बहुत कठिनाइयों का सामना कर रही थी, उसके साथ एक युवक ने वर्षों तक यौन शोषण किया। पीड़िता की मजबूरी और डर का फायदा उठाते हुए आरोपी ने चाकू की नोक पर उसके साथ दुष्कर्म किया। अंततः न्यायपालिका ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए 20 साल की सख्त सजा सुनाई।


पीड़िता की कहानी

गांव की रहने वाली यह नाबालिग लड़की पहले से ही असहाय थी। उसकी उम्र कम होने के कारण वह अपने अधिकारों और सुरक्षा के प्रति पूरी तरह जागरूक नहीं थी। माता-पिता के अभाव में वह अपनी दादी के साथ रहती थी। ऐसे समय में आरोपी ने उसकी मजबूरी का पूरा फायदा उठाया।

लड़की को धमकाकर और डराकर आरोपी ने वर्षों तक उसके साथ यौन शोषण किया। वह बार-बार अपने परिवार और रिश्तेदारों से मदद मांगती रही, लेकिन कोई भी सुनवाई नहीं कर रहा था। डर और मानसिक दबाव के कारण वह चुप रही। अंततः उसने साहस करके पुलिस में शिकायत दर्ज कराई और न्याय की राह दिखाई।

नाबालिग को डरा धमका कर उसके गांव का ही युवक दो वर्षों तक लगातार दुष्कर्म करता रहा। किशोरी ने युवक के परिजनों को भी इसकी जानकारी देते हुए उससे पीछा छुड़वाने की गुहार लगाई परंतु नतीजा सिफर ही रहा। इस पर पीडि़ता ने चक्रधरनगर थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई। पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर अभियोग पत्र न्यायालय में पेश किया था। उभयपक्ष की सुनवाई केे बाद कोर्ट ने युवक को दोषी करार देते हुए उसे 20 वर्ष के सश्रम कारावास एवं 6 हजार रुपये के अर्थदण्ड से दण्डित किया है।

मिली जानकारी के अनुसार चक्रधरनगर थाना क्षेत्र के ग्राम भिखारीमाल निवासी नाबालिग किशोरी के माता-पिता का देहांत हो चुका है, जिसकी वजह से वह अपनी बूढ़ी दादी के साथ रहती है।11 जनवरी 2024 के दो वर्ष पूर्व किशोरी रात को तकरीबन 9 बजे दिशा मैदान के लिए निकली थी तब गांव का ही युवक शिशुपाल सेठ ने खेत में उसे चाकू दिखाते हुए जान से मार देने की धमकी देकर अनाचार किया। वहीं यह बात किसी को नहीं बताने को कहा। इससे किशोरी काफी डर गई थी और भय से उसने घटना के विषय में किसी को नहीं बताया।

इस बात का फायदा उठाते हुए शिशुपाल जब मन करता था तब किशोरी को बुलाकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाने लगा। तकरीबन दो वर्षों तक किशोरी उसके सितम सहती रही। वहीं एक  दिन हिम्मत कर उसने शिशुपाल के माता-पिता और उसके बड़े भाई से इस बात की शिकायत करते हुए उससे पीछा छुड़वाने की गुहार लगाई, लेकिन शिशुपाल के परिजनों ने उसकी बात को अनसुनी कर दिया। वहीं 11 जनवरी 2024 को एक बार फिर शिशुपाल ने किशोरी के साथ दुष्कर्म किया। आखिरकार पीडि़ता ने थाने की शरण ली।

पीडि़ता ने शिशुपाल के विरूद्ध चक्रधर नगर थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी। वहीं किशोरी की रिपोर्ट पर जांच उपरांत पुलिस ने आरोपी शिशुपाल सेठ के विरूद्ध भादवि की धारा 376 (2) (ढ), 506 बी व पॉक्सो एक्ट के तहत अपराध पंजीबद्ध कर उसे गिरफ्तार करते हुए अभियोग पत्र न्यायालय में पेश किया।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश एफ. टी. एस. टी (पॉक्सो) देवेन्द्र साहू ने आरोपी शिशुपाल सेठ पिता संतराम सेठ निवासी भिखारीमाल को दोषी करार देते हुए भादंवि की धारा 506 बी के अपराध के लिए एक वर्ष के सश्रम कारावास व एक हजार रूपए का अर्थदण्ड तथा भादवि की धारा 376 (2)(ढ) व पॉक्सो एक्ट के अपराध के लिए 20 वर्ष सश्रम कारावास एवं 5 हजार रूपए के अर्थदण्ड से दण्डित किया है। उक्त प्रकरण में शासन की ओर से अपर लोक अभियोजक मोहन सिंह ठाकुर ने पैरवी की है।


कानूनी पहलू और प्रक्रिया

पीड़िता की शिकायत के बाद पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की। आरोपी के खिलाफ पॉक्सो एक्ट और भारतीय दंड संहिता की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया। पॉक्सो एक्ट बच्चों और नाबालिगों के खिलाफ यौन अपराधों को रोकने और दंडित करने के लिए बनाया गया है। इसके तहत अपराधी को कड़ी सजा और जुर्माने के साथ-साथ पीड़िता को मुआवजा दिलाने का प्रावधान है।

पुलिस और अदालत की भूमिका

  1. शिकायत दर्ज करना: पीड़िता या उसके अभिभावक की शिकायत पर प्राथमिकी दर्ज की गई।

  2. जांच: पुलिस ने फोरेंसिक, मेडिकल और गवाहों के बयान इकट्ठा किए।

  3. चार्जशीट दाखिल: सभी साक्ष्यों और सबूतों के आधार पर आरोपी के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई।

  4. अदालत में सुनवाई: अदालत ने अभियोजन और बचाव पक्ष दोनों की दलीलों को सुना।

  5. निर्णय और सजा: अदालत ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए 20 साल की जेल सजा सुनाई।

इस प्रक्रिया से यह स्पष्ट होता है कि कानून न केवल दोषी को सजा देने के लिए है बल्कि पीड़िता के लिए न्याय और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए भी है।


अदालत का फैसला

कोर्ट ने आरोपी के अपराध की गंभीरता को देखते हुए उसे दोषी ठहराया और कुल 20 साल का सख्त कारावास सुनाया। इसके अलावा आरोपी पर जुर्माना भी लगाया गया। न्यायाधीश ने कहा कि ऐसे अपराध केवल अपराध नहीं हैं, बल्कि बच्चों के मानवाधिकारों का उल्लंघन हैं।

अदालत ने यह स्पष्ट किया कि नाबालिग की मजबूरी और डर का फायदा उठाना, चाकू की नोक पर बार-बार दुष्कर्म करना और लगातार वर्षों तक शोषण करना बेहद गंभीर अपराध है। न्यायपालिका ने यह संदेश दिया कि ऐसे अपराधियों को कोई राहत नहीं मिलेगी।


समाज के लिए संदेश

यह मामला समाज और कानून दोनों के लिए महत्वपूर्ण सबक है।

  • बच्चों की सुरक्षा सर्वोपरि है: नाबालिगों के साथ किसी भी प्रकार का शोषण गंभीर अपराध है।

  • डर और धमकी से अपराध कम नहीं माना जाएगा: अपराधी को डर या धमकी का सहारा लेकर कोई छूट नहीं मिलेगी।

  • न्यायपालिका का सख्त रुख: अदालत ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि दोषी को सख्त सजा मिलेगी।

समाज को यह समझना होगा कि सिर्फ अदालत का फैसला ही पर्याप्त नहीं है। परिवार, स्कूल, मोहल्ला और समाज को मिलकर बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी।


पीड़ितों की मदद और समर्थन

पीड़िता की हिम्मत और साहस ने उसे न्याय दिलाया। समाज को यह सीख लेनी चाहिए कि पीड़ितों को समर्थन देना बेहद जरूरी है।

  • सामाजिक और मानसिक समर्थन: पीड़ितों को मानसिक और भावनात्मक सहायता देना आवश्यक है।

  • शिक्षा और जागरूकता: बच्चों को उनके अधिकारों और सुरक्षा के उपायों के बारे में शिक्षित करना चाहिए।

  • सतर्कता: समाज और परिवार को बच्चों के आसपास सतर्क रहना चाहिए और असामान्य घटनाओं पर तुरंत कार्रवाई करनी चाहिए। Kelo Pravah


न्याय और सुधार

कोर्ट का फैसला केवल सजा देने तक सीमित नहीं है। यह समाज में बच्चों की सुरक्षा और न्याय की आवश्यकता को भी उजागर करता है।

  • कानून का संदेश: न्यायपालिका ने स्पष्ट कर दिया कि नाबालिगों के खिलाफ अपराधों पर किसी प्रकार की सहनशीलता नहीं होगी।

  • सामाजिक संदेश: समाज को बच्चों के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।

  • पीड़िता का अधिकार: पीड़ितों को न्याय और सुरक्षा दिलाने के लिए कानूनी और सामाजिक समर्थन जरूरी है।

रायगढ़ कोर्ट का यह फैसला समाज और न्यायपालिका दोनों के लिए एक चेतावनी है कि नाबालिगों के खिलाफ अपराध बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यह केवल सजा का मामला नहीं है, बल्कि समाज और सरकार की जिम्मेदारी का संकेत भी है।

हमारे समाज को यह सुनिश्चित करना होगा कि बच्चे सुरक्षित रहें, उनके अधिकारों का सम्मान हो और किसी भी प्रकार का यौन शोषण बर्दाश्त न किया जाए।

पीड़िता की हिम्मत, अदालत की कड़ी कार्रवाई और समाज की जागरूकता मिलकर बच्चों के भविष्य को सुरक्षित बना सकती है।

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