छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया 7 कारण जिनसे लाल किले तक पहुंचा छत्तीसगढ़ का गौरव

लाल किले में गूंजा “छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया” 7 कारण जिनसे लाल किले तक पहुंचा

छत्तीसगढ़ की पहचान, संस्कृति और आत्मसम्मान का राष्ट्रीय मंच पर ऐतिहासिक क्षण

भारत की राजधानी दिल्ली स्थित लाल किला सदियों से सत्ता, संघर्ष और स्वाभिमान का प्रतीक रहा है। इसी ऐतिहासिक मंच से जब “छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया” का उद्घोष गूंजा, तो यह केवल एक नारा नहीं रहा, बल्कि छत्तीसगढ़ की अस्मिता, संस्कृति, मेहनतकश समाज और आत्मनिर्भर सोच का राष्ट्रीय स्वीकार बन गया। यह क्षण बताता है कि अब भारत की पहचान केवल महानगरों तक सीमित नहीं, बल्कि अंचल, जनजातीय विरासत और लोक-संस्कृति भी उतनी ही सशक्त आवाज़ रखती हैं।

छत्तीसगढ राज्य के बिलासपुर जिले की सांस्कृतिक संस्था ‘लोक श्रृंगार भारती’ के गेड़ी लोक नृत्य दल द्वारा सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) व संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार के आमंत्रण पर नई दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किला प्रांगण में गेड़ी नृत्य की प्रस्तुति दी गई।  7 से 13 दिसम्बर तक आयोजित अंतर्राष्ट्रीय समारोह में 180 देशों के प्रतिनिधियों की सहभागिता रहीं। समारोह में बिलासपुर के गेड़ी नर्तक दल ने अपनी प्रस्तुति से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

अंतर्राष्ट्रीय मंच पर छत्तीसगढ़ की कला संस्कृति को काफी सराहा गया। मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने इस गेडी नर्तक दल को बधाई और शुभकामनाएं दीं है।केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री श्री गजेंद्र सिंह शेखावत प्रभावित हुए। उन्होंने “छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया” का नारा दिया
समारोह का ऐतिहासिक क्षण तब आया जब भारत के महापर्व दीपावली को यूनेस्को द्वारा विश्व सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मान्यता प्रदान की गई।

इस उपलब्धि में छत्तीसगढ़ के गेड़ी लोक नृत्य दल की प्रस्तुति को विशेष सराहना मिली गेड़ी नृत्य की भावपूर्ण और साहसिक प्रस्तुति से केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री श्री गजेंद्र सिंह शेखावत प्रभावित हुए। उन्होंने “छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया” कहकर कलाकारों का उत्साहवर्धन किया।

गेड़ी नृत्य दल ने अपने रोमांचक प्रदर्शन से अंतर्राष्ट्रीय दर्शकों को रोमांचित कर दिया
मुख्य गायक एवं नृत्य निर्देशक अनिल गढ़ेवाल के कुशल नेतृत्व में गेड़ी नृत्य दल ने अपने सशक्त, ऊर्जावान एवं रोमांचक प्रदर्शन से अंतर्राष्ट्रीय दर्शकों को रोमांचित कर दिया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर, केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री श्री गजेंद्र सिंह शेखावत, दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमती रेखा गुप्ता, विभिन्न राज्यों के कलाकारों सहित 180 देशों के डेलिगेट्स उपस्थित रहे।

यूनेस्को के महानिदेशक डॉ. खालिद एन. एनानी सहित 180 देशों के प्रतिनिधियों ने गेड़ी नृत्य दल के साथ स्मृति चित्र लिए
मुख्य गायक अनिल गढ़ेवाल द्वारा प्रस्तुत “काट ले हरियर बांसे” गीत ने विदेशी प्रतिनिधियों के मन में छत्तीसगढ़ी संस्कृति के प्रति गहरी जिज्ञासा उत्पन्न की। वहीं मुख्य मांदल वादक मोहन डोंगरे द्वारा एक ही स्थान पर घूमते हुए मांदल वादन किया।

हारमोनियम वादक सौखी लाल कोसले एवं बांसुरी वादक महेश नवरंग की स्वर लहरियों पर विभिन्न देशों से आए प्रतिनिधि झूम उठे। गेड़ी नर्तकों प्रभात बंजारे, सूरज खांडे, शुभम भार्गव, लक्ष्मी नारायण माण्डले, फूलचंद ओगरे एवं मनोज माण्डले ने साहसिक करतबों से दर्शकों को रोमांचित किया। विशेष रूप से तब, जब एक गेड़ी पर संतुलन बनाते हुए कलाकारों ने मानवीय संरचनाएं बनाईं, पूरा प्रांगण तालियों से गूंज उठा।

गेड़ी नृत्य दल ने छत्तीसगढ़ राज्य को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सांस्कृतिक पहचान दिलाई
छत्तीसगढ़ की पारंपरिक वेशभूषा, कौड़ियों व चीनी मिट्टी की मालाएं, पटसन वस्त्र, सिकबंध एवं मयूर पंख धारण कर प्रस्तुत भाव नृत्य ने प्रस्तुति को और भी आकर्षक बना दिया। यूनेस्को के महानिदेशक डॉ. खालिद एन. एनानी सहित विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों ने गेड़ी नृत्य दल के साथ स्मृति चित्र लिया व छत्तीसगढ़ राज्य को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सांस्कृतिक पहचान दिलाने के लिए शुभकामनाएं दी।


“छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया” – अर्थ और भाव

यह वाक्य छत्तीसगढ़ के स्वाभिमान का सूत्रवाक्य है। “छत्तीसगढ़िया” यानी छत्तीसगढ़ का निवासी, और “सबले बढ़िया” यानी सबसे श्रेष्ठ—यह श्रेष्ठता धन या पद की नहीं, बल्कि श्रम, सरलता, सामुदायिकता और प्रकृति से जुड़ाव की है। खेतों में पसीना बहाने वाले किसान, जंगलों की रक्षा करने वाले आदिवासी समाज, खदानों और कारखानों में काम करने वाले श्रमिक—सबकी सामूहिक पहचान इसमें समाहित है।

“छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया” केवल एक नारा नहीं है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की आत्मा, सोच और जीवन-दर्शन को अभिव्यक्त करने वाला भावपूर्ण कथन है। इस वाक्य में छत्तीसगढ़ के आम जनमानस का आत्मसम्मान, संघर्ष, सरलता और सामूहिक चेतना समाहित है।

शाब्दिक अर्थ

  • छत्तीसगढ़िया – छत्तीसगढ़ का निवासी, जो इस मिट्टी, संस्कृति और परंपराओं से जुड़ा है।

  • सबले बढ़िया – सबसे श्रेष्ठ, सबसे बेहतर।

इसका सीधा अर्थ हुआ – छत्तीसगढ़ का व्यक्ति सबसे बढ़िया है।
लेकिन इसका भावार्थ कहीं अधिक गहरा और व्यापक है।


भावनात्मक और सांस्कृतिक अर्थ

यह नारा यह नहीं कहता कि छत्तीसगढ़ का व्यक्ति किसी और से श्रेष्ठ है, बल्कि यह संदेश देता है कि छत्तीसगढ़ का जनजीवन अपने मूल्यों, मेहनत और ईमानदारी के कारण विशिष्ट और सम्मान योग्य है।

यह कथन छत्तीसगढ़ के किसान, मजदूर, आदिवासी, महिलाएं और युवा—सभी को एक साझा पहचान देता है। इसमें मेहनतकश जीवनशैली, सामूहिक सहयोग, प्रकृति के प्रति सम्मान और सादगी का गौरव झलकता है।


स्वाभिमान और आत्मविश्वास का प्रतीक

लंबे समय तक छत्तीसगढ़ को संसाधनों की भूमि के रूप में देखा गया, लेकिन इस नारे ने यह स्थापित किया कि यहां के लोग केवल संसाधन देने वाले नहीं, बल्कि संस्कार, संस्कृति और संवेदनशीलता से भरपूर हैं।
“छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया” कहना अपने अस्तित्व को स्वीकार करने और गर्व से सामने रखने का साहस है।


सामाजिक एकता का संदेश

यह नारा जाति, वर्ग और क्षेत्र से ऊपर उठकर पूरे छत्तीसगढ़ को एक सूत्र में बांधता है। चाहे वह बस्तर का आदिवासी अंचल हो या मैदानी इलाका, यह वाक्य हर छत्तीसगढ़वासी को बराबरी का एहसास कराता है।


लाल किले तक पहुँची छत्तीसगढ़ की आवाज़

लाल किले पर यह उद्घोष उस परिवर्तन का प्रतीक है, जिसमें क्षेत्रीय संस्कृतियाँ राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र बन रही हैं। छत्तीसगढ़ की लोक-भाषा, लोक-संगीत, नृत्य और परंपराएँ अब मंच के किनारे नहीं, बल्कि केंद्र में दिखाई देने लगी हैं। यह स्वीकारोक्ति बताती है कि विविधता ही भारत की शक्ति है।

नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा

आज के युवाओं के लिए यह नारा अपनी जड़ों से जुड़े रहने की सीख देता है। आधुनिकता के साथ अपनी भाषा, बोली, पहनावे और संस्कृति को अपनाने का आत्मविश्वास इसी भाव से आता है।

“छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया” गर्व, आत्मसम्मान और सांस्कृतिक पहचान का घोष है। यह बताता है कि सच्ची श्रेष्ठता धन या शक्ति में नहीं, बल्कि मेहनत, मानवता और संस्कारों में होती है। यही भाव इस नारे को छत्तीसगढ़ की पहचान और आत्मा बनाता है।


छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत

लोकनृत्य और लोकगीत

पंथी, राउत नाचा, कर्मा, सुआ—ये नृत्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और ऋतु-चक्र से जुड़ी आस्थाओं के वाहक हैं। लाल किले के संदर्भ में इनका स्मरण राष्ट्रीय मंच पर छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक उपस्थिति को रेखांकित करता है।

वेशभूषा और शिल्प

कोसा रेशम, ढोकरा कला, बस्तर की लौह शिल्प परंपरा—ये सब छत्तीसगढ़ की पहचान हैं। “छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया” का उद्घोष इन कारीगरों के हाथों की कला को सम्मान देता है।


जनजातीय समाज की भूमिका

छत्तीसगढ़ की आत्मा उसके आदिवासी समुदायों में बसती है। उनकी प्रकृति-सम्मत जीवनशैली, सामुदायिक निर्णय प्रणाली और लोकज्ञान आज के सतत विकास मॉडल के लिए प्रेरक हैं। लाल किले पर इस पहचान का उभार यह संकेत है कि भारत अपने मूल निवासियों के ज्ञान को भी बराबरी का स्थान दे रहा है।


राजनीतिक और सामाजिक संदेश

यह उद्घोष केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि नीतिगत संदेश भी देता है—राज्यों और क्षेत्रों की विशिष्टताओं को स्वीकार कर ही राष्ट्रीय विकास संभव है। छत्तीसगढ़ जैसे संसाधन-समृद्ध राज्य की आवाज़ जब राष्ट्रीय मंच पर गूंजती है, तो यह संतुलित विकास की मांग को भी रेखांकित करती है।


नेतृत्व और दृष्टि

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय सहित राज्य के नेतृत्व ने बार-बार यह कहा है कि छत्तीसगढ़ की पहचान उसकी संस्कृति और लोगों से है। वहीं, राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी द्वारा विविध भाषाओं, लोककलाओं और राज्यों की परंपराओं को मंच देना “एक भारत–श्रेष्ठ भारत” की अवधारणा को सशक्त करता है।


युवाओं के लिए प्रेरणा

जब लाल किले से किसी क्षेत्रीय पहचान का उद्घोष होता है, तो वह उस राज्य के युवाओं में आत्मविश्वास भरता है। छत्तीसगढ़ के युवा अब अपनी बोली, अपने पहनावे और अपनी परंपराओं को गर्व से अपनाने लगे हैं। यह सांस्कृतिक आत्मविश्वास नवाचार और उद्यमिता को भी बढ़ावा देता है।


मीडिया और जनमानस की प्रतिक्रिया

देशभर में इस उद्घोष की चर्चा हुई। सोशल मीडिया से लेकर जनसभाओं तक “छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया” ट्रेंड करने लगा। यह प्रतिक्रिया बताती है कि भारत का जनमानस क्षेत्रीय गर्व को राष्ट्रीय एकता के विरुद्ध नहीं, बल्कि उसका पूरक मानता है। Navbharat Times


ऐतिहासिक संदर्भ और भविष्य

लाल किला केवल इतिहास नहीं, भविष्य का संकेत भी देता है। यहाँ से निकली हर आवाज़ आने वाली पीढ़ियों के लिए दिशा तय करती है। छत्तीसगढ़ की यह गूंज बताती है कि भविष्य का भारत बहुरंगी होगा—जहाँ हर राज्य, हर भाषा और हर संस्कृति समान सम्मान पाएगी।

लाल किले में “छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया” का गूंजना एक ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक उपलब्धि है। यह छत्तीसगढ़ के मेहनतकश लोगों, समृद्ध परंपराओं और जीवंत संस्कृति को राष्ट्रीय मान्यता देता है। यह क्षण याद दिलाता है कि भारत की असली ताकत उसकी विविधता में है—और जब हर क्षेत्र की पहचान सम्मान पाती है, तभी राष्ट्र सशक्त बनता है।

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