बिना बैंक गारंटी के (2025) मिलरों के पास जमा करोड़ों का धान खतरे, कारण और समाधान

बिना बैंक गारंटी के मिलरों के पास जमा करोड़ों का धान(2025)प्रणाली की खामियों, जोखिमों और समाधान पर विस्तृत रिपोर्ट

देश के खाद्य सुरक्षा तंत्र में धान की खरीदी, भंडारण और चावल मिलिंग का चक्र बेहद महत्वपूर्ण है। किसानों द्वारा बेचा गया धान सरकार के पास जाता है, उसे मिलरों को चावल बनाने के लिए दिया जाता है, और फिर वह चावल सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से गरीब और जरूरतमंद परिवारों तक पहुँचता है। यह चक्र जितना सरल दिखता है, उतना ही जटिल और जोखिमों से भरा होता है।

इन जोखिमों में सबसे बड़ी समस्या तब सामने आती है जब मिलरों को करोड़ों रुपये का धान बिना किसी बैंक गारंटी या सुरक्षा के दे दिया जाता है। यह धान सरकारी संपत्ति होती है, इसलिए इसे बिना सिक्योरिटी के देना न तो सुरक्षित है, न ही यह व्यवस्था के अनुसार उचित। बावजूद इसके, कई जगहों पर धान मिलरों के पास वर्षों से पड़ा हुआ है, कई बार वे निर्धारित समय सीमा में चावल वापस नहीं देते, और कभी-कभी धान गायब होने या मिलर के फरार होने जैसी गंभीर स्थितियाँ भी सामने आ जाती हैं।

कस्टम मिलिंग की व्यवस्था में एक साल का काम दूसरे साल तक जाता ही है। दो वर्षों की मिलिंग ओवरलैप होती है। इस बार तो बैंक गारंटी में भी खेल हो गया। पिछले साल का चावल जमा नहीं हो सका लेकिन बीजी की अवधि समाप्त हो चुकी है। मतलब मार्कफेड का करोड़ों का धान मिलर्स के पास है लेकिन वसूली के लिए जरूरी बीजी हाथ में नहीं है।

कोई मिलर चावल जमा नहीं करे तो रिकवरी का कोई रास्ता ही नहीं है। मार्कफेड से उसी मिलर को धान मिलता है जिसका पंजीयन हो और जिसने बैंक गारंटी भी जमा की हो। बीजी के लिए धान की कीमत 2500 रुपए प्रति क्विंटल आंकी जाती है। वर्ष 24-25 में नागरिक आपूर्ति निगम और एफसीआई में चावल जमा करने के लिए मिलों का पंजीयन किया गया था। बैंक गारंटी के लिए अलग फार्मूला अपनाया गया। 1500 रुपए प्रति क्विंटल की बैंक गारंटी और 1000 रुपए प्रति क्विंटल की दर से चैक दिया गया।


सरकारी धान और मिलिंग प्रणाली: एक परिचय

धान खरीदी का सीजन आने पर किसान अपनी उपज सरकारी खरीदी केन्द्रों पर बेचते हैं। इस उपज को खाद्य विभाग, मार्कफेड, नागरिक आपूर्ति निगम या जिला प्रशासन की निगरानी में संग्रहीत किया जाता है। इसके बाद इस धान की मिलिंग के लिए मिलरों को धान दिया जाता है।

बदले में मिलर को निम्नलिखित दायित्व निभाने होते हैं—

  • धान से निकला चावल तय मानक के अनुसार सरकार को लौटाना

  • यह प्रक्रिया निर्धारित समय सीमा में पूरा करना

  • अपने दायित्व की सुरक्षा के लिए बैंक गारंटी, ज़मानत या सुरक्षा राशि देना

बैंक गारंटी इसलिए ली जाती है कि अगर मिलर समय पर चावल नहीं लौटाता है, या अनुबंध का उल्लंघन करता है, तो सरकार बैंक गारंटी भुना सकती है और अपना नुकसान बचा सकती है।

लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब—

मिलरों के पास करोड़ों का धान होता है, पर उनके पास न बैंक गारंटी होती है, न सुरक्षा राशि।

यहीं से शुरू होती है पूरे सिस्टम में गड़बड़ी और खतरे की कहानी।


बिना बैंक गारंटी के धान मिलरों के पास क्यों पहुँच जाता है?

यह सवाल हर किसी के मन में आता है कि इतनी बड़ी सरकारी संपत्ति किसी मिलर को बिना सुरक्षा के क्यों दी जाती है? इसके कई कारण सामने आते हैं:

 स्थानीय स्तर पर लापरवाही या उदारता

कई बार स्थानीय अधिकारियों या समितियों द्वारा मिलरों पर भरोसा कर लिया जाता है, यह सोचकर कि मिलर वर्षों से काम कर रहा है, इसलिए गारंटी की जरूरत नहीं। यह सोच आगे चलकर बड़े संकट का कारण बनती है।

 राजनीतिक या सामाजिक दबाव

कुछ मिलरों का प्रभाव क्षेत्र में ज्यादा होता है। दबाव या सिफारिश के कारण भी गारंटी को नजरअंदाज कर धान दिया जाता है।

 खरीदी सीजन की तात्कालिकता

सीजन में धान तेजी से जमा होता है। भंडारण की समस्या से बचने के लिए अधिकारी जल्दी-जल्दी धान मिलरों को भेजने लगते हैं, और कागज़ी प्रक्रियाओं को बाद में पूरा करने का वादा कर देते हैं, जो अक्सर अधूरी रह जाती हैं।

 पुराने नियमों का पालन न होना

कई बार मिलर पहले से ही गारंटी जमा कर चुके हैं, पर नया सीजन आने पर उनके खाते में गारंटी अपडेट नहीं की जाती। फिर भी उन्हें नया धान दे दिया जाता है।

 निरीक्षण प्रणाली की कमजोरी

अधिकांश जिलों में धान के स्टॉक की शारीरिक जांच समय पर नहीं होती। इससे मिलरों पर निगरानी कम हो जाती है।


बिना बैंक गारंटी के धान देने के क्या खतरे हैं?

सरकार, किसानों और जनता—all तीन के लिए खतरे एक जैसे हैं।

 धान गायब होने का जोखिम

कई जिलों में मिलरों के गोदामों से समय-समय पर धान गायब होने की खबरें आती हैं। बिना गारंटी के यह जोखिम और बढ़ जाता है।

 सरकार का करोड़ों का नुकसान

ध्यान देने वाली बात यह है कि धान की कीमत करोड़ों में होती है। मिसाल के तौर पर एक मध्यम आकार के जिले में कुछ मिलरों के पास भी हजारों क्विंटल धान भेजा जाता है, जिसकी कीमत बहुत बड़ी होती है।

 चावल समय पर वापस न आने से सार्वजनिक वितरण प्रणाली प्रभावित

सरकार को गरीबों के लिए समय पर चावल चाहिए। अगर मिलर चावल नहीं लौटाता, तो पूरा वितरण तंत्र प्रभावित हो जाता है।

 मिलर के अचानक फरार होने का खतरा

देश में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहाँ मिलर अचानक फैक्ट्री बंद कर भाग गए और सरकार का लाखों-करोड़ों का धान डूब गया।

खाद्य विभाग की साख प्रभावित

जब ऐसी खबरें आती हैं कि करोड़ों का धान बिना गारंटी के दे दिया गया है, तो सरकारी एजेंसियों की छवि पर भी असर पड़ता है।


ऐसी घटनाएँ किस तरह सामने आती हैं?

जब—

  • ऑडिट होता है

  • खाद्य विभाग स्टॉक जांच करता है

  • जिला प्रशासन की समीक्षा बैठकों में रिपोर्ट तैयार होती है

  • चावल जमा करने की समय सीमा खत्म हो जाती है

तब पता चलता है कि मिलर के पास भारी मात्रा में धान पड़ा है, पर बैंक गारंटी नहीं जमा है। कई बार मिलर बहाना बनाते हैं कि—

  • मार्केट खराब है

  • बिजली बिल ज्यादा है

  • मिलिंग मशीन खराब है

  • चावल की रिकवरी कम मिली

  • या कर्ज में डूबे हैं

पर सच्चाई यह होती है कि सरकार की संपत्ति जोखिम में होती है।


प्राकृतिक नुकसान का बहाना

कुछ मिलर धान के खराब होने का बहाना देते हैं, जैसे—

  • नमी बढ़ गई

  • धान में फफूंद लग गई

  • गोदाम खराब था

  • बारिश में पानी घुस गया

लेकिन विशेषज्ञ बताते हैं कि—

जब सरकारी धान दिया जाता है, तब उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी पूरी तरह मिलर की होती है। इसलिए प्राकृतिक नुकसान भी मिलर की लापरवाही माना जाता है।


प्रशासन की भूमिका और जिम्मेदारी

यह स्थानीय प्रशासन और खाद्य विभाग की जिम्मेदारी है कि—

  • किसी भी मिलर को धान देने से पहले बैंक गारंटी या सुरक्षा राशि पूरी तरह ली जाए।

  • स्टॉक की नियमित जांच हो।

  • समयसीमा में चावल जमा न करने वाले मिलरों पर तुरंत एफआईआर, रिकवरी, और ब्लैकलिस्टिंग की कार्रवाई की जाए।

  • धान के भंडारण की GPS लोकेशन, CCTV और ऑनलाइन वेरिफिकेशन सुनिश्चित किया जाए।

सबसे बड़ी बात—
“धन और धान–दोनों सरकारी हैं, इसलिए किसी भी प्रकार की ढिलाई की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।”


स्थानीय किसानों की चिंता

जब मिलर चावल जमा नहीं करते, तो उसका प्रभाव किसानों पर भी पड़ता है। अगले सीजन में प्रशासन मिलिंग और भंडारण की समस्याओं को देखते हुए खरीदी की मात्रा में सुधार करता है, जिससे कई किसानों की उपज खरीदी में अटक जाती है।

किसानों का कहना है कि—

  • अगर सरकार सख्त कदम उठाए

  • मिलरों पर कड़ी निगरानी रखे

  • और पुरानी बकाया मिलिंग को पहले पूरा करवाए

तभी सिस्टम सुचारू चलेगा। Kelo Pravah


समाधान क्या हो सकते हैं?

बैंक गारंटी को अनिवार्य करते हुए डिजिटल सत्यापन

हार्ड कॉपी के बजाय बैंक गारंटी सीधे बैंक से डिजिटल रूप में सत्यापित की जाए।

 जीपीएस आधारित स्टॉक मॉनिटरिंग

धान की बोरियों की लोकेशन रियल-टाइम में ट्रैक हो।

 मिलरों की रैंकिंग और पारदर्शिता

हर मिलर के पिछले प्रदर्शन, पेंडेंसी, समय पर चावल लौटाने की क्षमता का ऑनलाइन रेकॉर्ड सार्वजनिक हो।

 चावल जमा करने की समयसीमा में कड़ाई

एक दिन भी देरी होने पर स्वतः कार्रवाई की नीति बने।

ब्लैकलिस्टिंग और कानूनी कार्रवाई

कई मिलर वर्षों से बकाया छोड़कर भी नए सीजन में धान प्राप्त कर लेते हैं—यह बंद होना चाहिए।

 छोटे मिलरों की संख्या बढ़ाना

छोटे और नए मिलरों को मौका मिले, ताकि बड़े मिलरों पर निर्भरता कम हो।

 गोदाम सुरक्षा के उच्च मानक

अगर सरकारी धान मिलर के गोदाम में रखा गया है, तो उस गोदाम का सुरक्षा ऑडिट अनिवार्य हो।

“बिना बैंक गारंटी के मिलरों के पास जमा करोड़ों का धान” सिर्फ एक प्रशासनिक गलती नहीं है, यह सार्वजनिक संसाधनों के साथ गंभीर लापरवाही है। धान न केवल किसानों की मेहनत का प्रतीक है, बल्कि यह सरकार की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था का आधार भी है।

ऐसी स्थिति में—

  • कड़ाई जरूरी है

  • पारदर्शिता जरूरी है

  • तकनीकी निगरानी जरूरी है

तभी यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि सरकार का धान सुरक्षित रहे, मिलिंग समय पर हो, गरीबों तक चावल पहुंच सके, और किसी भी प्रकार का वित्तीय नुकसान न हो।

इस समस्या को केवल प्रशासनिक स्तर पर नहीं, बल्कि नीति, तकनीक और निगरानी—तीनों स्तरों पर सुधार की आवश्यकता है। तभी भविष्य में इस तरह की समस्या से बचा जा सकता है।

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