“5 कारण क्यों ओडिशा और छत्तीसगढ़ में कोयला ट्रेलरों की अघोषित जंग बढ़ रही है”

5 कारण क्यों ओडिशा और छत्तीसगढ़ में कोयला ट्रेलरों की अघोषित जंग कारण, प्रभाव और समाधान

भारत की अर्थव्यवस्था में कोयले का महत्व किसी परिचय का मोहताज नहीं है। बिजली उत्पादन, इस्पात उद्योग, उष्मीय ऊर्जा और विभिन्न उद्योगों में कोयले की आपूर्ति अत्यंत आवश्यक है। कोयला खदानों से उद्योगों तक इसे पहुँचाने का मुख्य साधन सड़क और रेल दोनों हैं।

हालांकि, हाल के वर्षों में ओडिशा और छत्तीसगढ़ के ट्रांसपोर्टरों के बीच कोयला ट्रेलरों को लेकर संघर्ष ने गंभीर रूप ले लिया है। यह सिर्फ आर्थिक विवाद नहीं बल्कि सामाजिक और प्रशासनिक मुद्दों को भी जन्म दे रहा है। कोल परिवहन कर रही ट्रेलर वाहनों को लेकर एक बार फिर ओडि़शा और छत्तीसगढ़ के ट्रांसपोर्टरों के बीच अघोषित जंग छिड़ गई है।

पूर्व में हुए समझौते को दरकिनार करते हुए ओडि़शा के वाहन यूनियन द्वारा रायगढ़ की ट्रेलरों को ओडि़शा में रोक दिया है तथा आये दिन वाहन चालकों से मारपीट भी की जाती है। इसको लेकर रायगढ़ ट्रेलर कल्याण मालिक संघ ने रविवार को हमीरपुर मार्ग पर धरना प्रदर्शन शुरू करते हुए ओडि़सा की गाडिय़ों को छत्तीसगढ़ प्रवेश पर रोक लगा दी है।

वहीं इस संबंध में पुलिस अधीक्षक को आवेदन दे कर वस्तुस्थिति से अवगत कराया गया है। रायगढ़ जिले के अधिकांश फैक्ट्रियों में ओडि़शा से कोयला आता है । ओडि़शा के सुन्दरगढ़ जिला अंतर्गत कुलडा, गारगनबहाल एवं मनोहरपुर से ओडि़शा के अलावा रायगढ़ के ट्रांसपोर्टरों की भी गाडिय़ां कोयला परिवहन करती हैं।

दो वर्ष पूर्व ओडि़शा के ट्रांसपोर्टरों द्वारा रायगढ़ जिले के ट्रेलर को लोडिंग नहीं करने देने पर रायगढ़ ट्रेलर मालिक कल्याण संघ द्वारा हड़ताल की गई थी। इस पर जिला प्रशासन ने हस्तक्षेप करते हुए दोनों पक्षों के साथ त्रिपक्षीय वार्ता की थी जिसमें यह बात तय हुई थी कि ओडि़शा क्षेत्र की 40 प्रतिशत गाडिय़ों को लोडिंग दी जावेगी। बताया जा रहा है कि ओडि़शा के ट्रांसपोर्टरों की तकरीबन 7 सौ वाहन व्यवसायिक प्रयोजन से रायगढ़ आती हैं जबकि रायगढ़ की दो सौ से ढाई सौ वाहन ही ओडि़शा से लोडिंग कर आती है।Amar Ujala

पूर्व में आडि़सा के बीजीएमएस यूनियन और रायगढ़ ट्रेलर मालिक कल्याण संघ के बीच हुए समझौते का ओडि़सा के यूनियन द्वारा अवहेलना की जा रही है।रायगढ़ के ट्रेलर मालिकों का कहना है कि भाड़ा कम देना व वाहन चालकों से मारपीट करना तथा चार दिनों तक एक वाहन को लोड नहीं होने देना इस प्रकार प्रताडि़त किया जाने लगा है। वहीं वर्तमान में रायगढ़ की लगभग दो सौ गाडिय़ों को रोक कर रखा गया है।

इस स्थिति को देखते हुए रायगढ़ ट्रेलर मालिक कल्याण संघ ने शनिवार की रात को बैठक  कर ओडि़शा की गाडिय़ों का भी छत्तीसगढ़ में प्रवेश पर रोक लगाने का निर्णय लिया गया। वहीं रविवार को हमीरपुर मार्ग पर संबलपुरी के पास टेंट लगा कर वाहन मालिक धरने पर बैठे हैं तथा ओडि़शा की गाडिय़ों को रायगढ़ में प्रवेश करने से रोक दिये हैं।


कोयला परिवहन का परिदृश्य

कोयला खदान और ट्रक परिवहन

ओडिशा के सुनदरगढ़, झारसुगुड़ा और बंधुभाहल जैसे क्षेत्र देश के सबसे बड़े कोयला भंडारों में शामिल हैं। यहां से कोयले को छत्तीसगढ़, मध्य भारत और अन्य राज्यों के बिजली संयंत्रों और उद्योगों तक पहुँचाया जाता है।

परिवहन में भारी ट्रेलर और मल्टी-एक्सल ट्रक का प्रमुख योगदान है। ये वाहन रोजाना हजारों टन कोयला खदानों से विभिन्न डेस्टिनेशन तक पहुंचाते हैं।

ट्रांसपोर्टरों की प्रमुख चुनौतियां

  1. भाड़े की दरों में असंतुलन: ईंधन, टायर, बीमा और अन्य लागत में वृद्धि के बावजूद भाड़े की दरों में कोई समुचित बढ़ोतरी नहीं हुई। इससे ट्रांसपोर्टरों को घाटा हो रहा है।

  2. टेंडर और परमिट प्रक्रिया में देरी: छत्तीसगढ़ और ओडिशा में ट्रांसपोर्टिंग टेंडर महीनों से अटके रहने के कारण ट्रांसपोर्टरों की योजनाएं प्रभावित हुई हैं।

  3. अवैध वसूली और भ्रष्टाचार: कोयला परिवहन में कुछ स्थानों पर अवैध वसूली और कमीशन जैसी समस्याएं देखी गई हैं, जो ट्रांसपोर्टरों के लिए परेशानी का कारण बनी हैं।


विवाद की उत्पत्ति

भाड़े दरों को लेकर असहमति

ट्रांसपोर्टरों का मानना है कि वर्तमान भाड़े दरें न केवल पुरानी हैं बल्कि बढ़ती लागतों के साथ सामंजस्य नहीं रखतीं। यही कारण है कि कई ट्रांसपोर्ट संघों ने हड़ताल और विरोध प्रदर्शन किए हैं।

मार्ग और रूट का संघर्ष

कोयला ट्रकों के लगातार आवागमन से ग्रामीण क्षेत्रों में धूल, सड़क क्षति और दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं। ट्रांसपोर्टरों ने विशेष कोयला मार्ग या कारिडोर की मांग उठाई है, जिससे स्थानीय जीवन पर असर कम किया जा सके।

बड़े और छोटे ट्रांसपोर्टरों का टकराव

बड़े ट्रांसपोर्ट संगठन अधिक क्षमता वाले ट्रकों के संचालन का समर्थन करते हैं, जबकि छोटे ट्रांसपोर्टर इसे अपनी रोज़गार संभावनाओं के लिए खतरा मानते हैं। यही टकराव अक्सर विवाद का कारण बनता है।


सामाजिक और आर्थिक प्रभाव

उद्योगों पर प्रभाव

कोयला बिजली संयंत्रों और उद्योगों के लिए बुनियादी इनपुट है। ट्रांसपोर्टरों की हड़ताल या संघर्ष से कोयला आपूर्ति बाधित होती है, जिससे उत्पादन में कमी और लागत बढ़ जाती है।

स्थानीय निवासियों पर प्रभाव

सड़क क्षति, धूल और ध्वनि प्रदूषण से ग्रामीण जीवन प्रभावित होता है। अक्सर ग्रामीण प्रशासन से मांग करते हैं कि ट्रकों के लिए विशेष मार्ग बनाए जाएं।

प्रशासनिक दबाव

राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करना होता है कि कोयला आपूर्ति बाधित न हो और ट्रांसपोर्टरों के हित सुरक्षित रहें। इसके लिए नई नीति, निगरानी और लॉजिस्टिक सुधार की आवश्यकता होती है।


प्रशासन और सरकारी कदम

  1. टेंडर और परमिट सुधार: ऑनलाइन परमिट प्रणाली और पारदर्शी टेंडर प्रक्रिया लागू की गई है।

  2. रेल नेटवर्क और विशेष कारिडोर: ट्रक पर दबाव कम करने के लिए रेल विस्तार और कोयला कोरिडोर के निर्माण पर विचार किया जा रहा है।

  3. निगरानी और नियंत्रण: अवैध वसूली और भ्रष्टाचार पर कड़ी निगरानी रखी जा रही है।


समाधान की संभावनाएं

  1. न्यायसंगत भाड़ा आयोग: ईंधन, रख-रखाव, बीमा और श्रम लागत को ध्यान में रखते हुए भाड़ा तय करने के लिए स्वतंत्र आयोग का गठन।

  2. संयुक्त राज्यीय लॉजिस्टिक नीति: ओडिशा और छत्तीसगढ़ सरकारों द्वारा साझा नीति तैयार करना, जिसमें कोयला मार्ग, ट्रक उपयोग नियम और रेल लिंक शामिल हों।

  3. विशेष कोयला कारिडोर और रेल विस्तार: सड़क पर दबाव कम करने और दुर्घटनाएं घटाने के लिए कोयला मार्गों को रेल और विशेष सड़क मार्ग से जोड़ना।

ओडिशा और छत्तीसगढ़ में कोयला ट्रेलरों को लेकर चल रही अघोषित जंग सिर्फ ट्रांसपोर्टरों की लड़ाई नहीं है। यह आर्थिक, सामाजिक और प्रशासनिक मुद्दों का मिश्रण है।

ट्रांसपोर्टरों की मांगें जायज़ हैं, लेकिन दीर्घकालीन समाधान केवल पारदर्शी नीति, साझा कदम और तकनीकी अवसंरचना निवेश से ही संभव है। संघर्ष और विरोध से केवल समस्या बढ़ेगी, समाधान नहीं।

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