4 करोड़ का गबन बड़े नवापारा सहकारी समिति घोटाले की जांच क्यों नहीं हुई?

बड़े नवापारा समिति में फूटा घोटाला 4 करोड़ के गबन पर आज भी अधूरी जांच, कई सवाल खड़े

छत्तीसगढ़ में सहकारी समितियाँ ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती हैं। किसानों को खाद, बीज, ऋण और सरकारी योजनाओं का लाभ इन्हीं समितियों के माध्यम से मिलता है। लेकिन जब यही संस्थाएं भ्रष्टाचार का अड्डा बन जाएं, तो सबसे बड़ा नुकसान आम किसानों और ग्रामीण जनता को उठाना पड़ता है।
ऐसा ही एक गंभीर मामला सामने आया है बड़े नवापारा सहकारी समिति से, जहां करीब 4 करोड़ रुपये के गबन का मामला उजागर होने के बावजूद आज तक ठोस जांच और कार्रवाई नहीं हो पाई है

यह मामला सिर्फ पैसों की हेराफेरी का नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही, जवाबदेही की कमी और सिस्टम में गहरे बैठे भ्रष्टाचार को उजागर करता है।

बरमकेला ब्लॉक के सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहने वाले बड़े नवापारा सहकारी समिति पर अफसरों की मेहरबानी अलग लेवल की है। सालों से लोन गड़बड़ी, धान की बोगस खरीदी और नियम विरुद्ध आहरण के कई मामले सामने आ चुके हैं, लेकिन सहकारिता विभाग ही इसका रक्षक बना हुआ है। अपेक्स बैंक में समिति का पूरा कच्चा-चिट्ठा रखा हुआ है।

लंबे समय से बड़े नवापारा समिति में एकाधिकार है। हर साल गंभीर आरोपों से घिरने के बावजूद न तो जांच हुई और न ही कार्रवाई। बताया जा रहा है कि समिति प्रबंधक वर्षों से घपले करता आ रहा है। फर्जी लोन निकालने और खाद की नियम विरुद्ध बिक्री के कारण समिति का एकाउंट अस्त-व्यस्त है। पिछली सरकार ने संचालक मंडल भंग किया लेकिन प्रबंधकों का कुछ नहीं बिगाड़ पाए।

बरमकेला अपेक्स बैंक में दस करोड़ का गबन उजागर होने के बाद बड़े नवापारा समिति का भी नाम आया था। वर्तमान में समिति प्रबंधक पर 3 करोड़ 95 लाख रुपए के गबन और वित्तीय अनियमितता का मामला उजागर हो चुका है।

इसके दस्तावेजी प्रमाण सहकारिता विभाग और अपेक्स बैंक में मौजूद हैं। किसानों का आरोप है कि कीर्ति चंद चौहान द्वारा उनकी जानकारी और सहमति के बिना ऋण निकालकर रकम का गबन किया गया। इस वर्ष भी कई किसानों के नाम पर फर्जी तरीके से ऋण निकाले जाने की शिकायतें सामने आई हैं। सहकारिता विभाग ने एक बार जांच की लेकिन कार्रवाई नहीं हो सकी। स्थानीय किसानों के अनुसार यदि समिति प्रबंधक की आय और संपत्ति की जांच कराई जाए तो वर्षों से चले आ रहे भ्रष्टाचार की परतें खुल सकती हैं।

लिमिट से कई गुना अधिक निकाला ऋण

समिति में हर साल खरीफ सीजन के लिए केसीसी लोन की लिमिट तय की जाती है। पिछले सीजन के ऋण वितरण और वसूली के हिसाब से नई लिमिट तय होती है। बरमकेला अपेक्स बैंक ब्रांच में छह समितियों में इस लिमिट से कई गुना अधिक ऋण निकाल लिया गया। छह समितियों बड़े नावापारा, बोंदा, लोधिया, साल्हेओना, पंचधार और कंठीपाली में ब्याज अनुदान के अनुसार कुल 1.97 करोड़ का लोन स्वीकृत था।

लेकिन समिति के अल्पकालीन ऋण खाते से 15.63 करोड़ रुपए निकाल लिए गए। मतलब कुल 13.67 करोड़ रुपए का फर्जी आहरण कर लिया गया। इस सूची में बड़े नवापारा सबसे पहले स्थान पर है। यहां 3.95 करोड़ का गबन है। सहकारिता विभाग ने जांच में यह गड़बड़ी पकड़ी थी लेकिन अब डीआरसीएस इसे दबाने में लगे हैं।

गबन में भी मिला कमीशन

बरमकेला अपेक्स बैंक ब्रांच में करीब दस करोड़ का गबन किया गया था। समितियों के एकाउंट से राशि का नकद और ऑनलाईन ट्रांजेक्शन किया गया था। उसमें बड़े नवापारा समिति भी शामिल है। बताया जा रहा है कि रकम आहरण के बाद प्रबंधकों को भी कमीशन दिया गया है। बताया जा रहा है कि बरमकेला ब्रांच में समिति की लिमिट से अधिक लोन बांटकर राशि आहरित कर ली गई। घोटाले में प्रबंधक भी शामिल हैं।

क्या कहते हैं कलेक्टर
मुझे इसकी जानकारी मिली है। सहकारिता विभाग और अपेक्स बैंक के माध्यम से कार्रवाई कराई जाएगी।
– संजय कन्नौजे, कलेक्टर, सारंगढ़-बिलाईगढ़

क्या कहते हैं साहू
मुझे नहीं मालूम आप किस गड़बड़ी की बात कर रहे हैं। इसकी मुझे कोई जानकारी नहीं दी गई है। देखता हूं, क्या कर सकता हूं।
– व्यास नारायण साहू, डीआरसीएस


बड़े नवापारा समिति का महत्व

बड़े नवापारा सहकारी समिति क्षेत्र के सैकड़ों किसानों से जुड़ी हुई है। यह समिति:

  • किसानों को फसल ऋण उपलब्ध कराती है

  • धान खरीदी और भंडारण से जुड़ी होती है

  • सरकारी योजनाओं की राशि का वितरण करती है

  • किसानों के बैंक खातों और ऋण खातों का संचालन करती है

ऐसी स्थिति में यदि इस संस्था में गबन होता है, तो उसका सीधा असर किसानों की आर्थिक स्थिति, उनकी साख और भविष्य पर पड़ता है।


कैसे उजागर हुआ घोटाला

बड़े नवापारा समिति में घोटाले की भनक तब लगी जब कुछ किसानों ने शिकायत की कि:

  • उनके खातों से पैसे निकाले गए हैं

  • उनके नाम पर ऋण दर्ज है, जबकि उन्होंने कोई ऋण नहीं लिया

  • समिति के रिकॉर्ड और वास्तविक स्थिति में भारी अंतर है

इसके बाद जब आंतरिक स्तर पर दस्तावेजों की जांच की गई, तो सामने आया कि करीब 4 करोड़ रुपये की राशि का हिसाब मेल नहीं खा रहा हैPatrika News

यह राशि अलग-अलग तरीकों से निकाली गई:

  • फर्जी किसानों के नाम पर ऋण

  • असली किसानों के खातों से अवैध निकासी

  • बिना वाउचर और बिना अनुमति के भुगतान

  • समिति की राशि को निजी खातों में ट्रांसफर


गबन का तरीका: सुनियोजित और योजनाबद्ध

जांच के शुरुआती निष्कर्षों से साफ हुआ कि यह कोई एक दिन में हुआ घोटाला नहीं था, बल्कि लंबे समय से योजनाबद्ध तरीके से किया गया गबन था।

मुख्य तरीके

  1. फर्जी ऋण खाते
    ऐसे किसानों के नाम पर ऋण दिखाया गया, जिन्हें इसकी जानकारी ही नहीं थी।

  2. डमी हस्ताक्षर और अंगूठा निशान
    कई दस्तावेजों में किसानों के फर्जी हस्ताक्षर पाए गए।

  3. कैश निकासी का दुरुपयोग
    नियमों के विरुद्ध नकद राशि निकाली गई।

  4. रिकॉर्ड में हेराफेरी
    कागजों में भुगतान दिखाया गया, लेकिन जमीन पर कुछ नहीं मिला।


कर्मचारियों की भूमिका संदेह के घेरे में

इस पूरे मामले में समिति के कुछ कर्मचारियों और अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध मानी जा रही है। आरोप है कि:

  • बिना मिलीभगत के इतना बड़ा गबन संभव नहीं

  • रिकॉर्ड जानबूझकर अधूरे रखे गए

  • ऑडिट के समय जानकारी छिपाई गई

हालांकि अभी तक किसी बड़े आरोपी पर कठोर कानूनी कार्रवाई नहीं हुई है, जिससे जनता में नाराजगी है।


सबसे बड़ा सवाल: जांच क्यों नहीं हुई?

घोटाले का खुलासा होने के बाद आमतौर पर अपेक्षा की जाती है कि:

  • विस्तृत जांच होगी

  • दोषियों पर एफआईआर दर्ज होगी

  • गबन की राशि वसूली जाएगी

लेकिन बड़े नवापारा समिति के मामले में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।

संभावित कारण

  • प्रशासनिक उदासीनता

  • प्रभावशाली लोगों का दबाव

  • जांच को जानबूझकर धीमा करना

  • जिम्मेदार अधिकारियों की चुप्पी

यह सवाल आज भी कायम है कि क्या यह मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है?


किसानों पर सीधा असर

इस घोटाले का सबसे बड़ा शिकार किसान बने हैं।

किसानों की समस्याएं

  • जिन किसानों के नाम पर फर्जी ऋण दिखाया गया, वे अब डिफॉल्टर माने जा रहे हैं

  • भविष्य में उन्हें बैंक ऋण मिलने में परेशानी

  • सरकारी योजनाओं से वंचित होने का खतरा

  • मानसिक तनाव और आर्थिक असुरक्षा

कई किसान यह तक नहीं समझ पा रहे कि उनकी गलती क्या है, फिर भी वे परेशानी झेल रहे हैं।


सहकारी व्यवस्था पर उठते सवाल

यह मामला केवल एक समिति तक सीमित नहीं है। यह पूरे सहकारी तंत्र पर सवाल खड़े करता है:

  • क्या ऑडिट प्रक्रिया ईमानदार है?

  • क्या अधिकारियों की जवाबदेही तय है?

  • क्या किसानों की सुरक्षा के लिए कोई मजबूत सिस्टम है?

यदि ऐसे मामलों पर सख्त कार्रवाई नहीं होती, तो भविष्य में और बड़े घोटाले सामने आ सकते हैं।


जनता और किसान संगठनों की मांग

क्षेत्र के किसान और सामाजिक संगठन मांग कर रहे हैं कि:

  • पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो

  • उच्च स्तरीय एजेंसी से जांच कराई जाए

  • दोषियों को सख्त सजा मिले

  • किसानों के नाम से दर्ज फर्जी ऋण समाप्त किए जाएं

  • गबन की राशि की वसूली की जाए


प्रशासन की चुप्पी

अब तक प्रशासन की ओर से कोई स्पष्ट बयान या ठोस कार्यवाही सामने नहीं आई है।
यह चुप्पी कई सवालों को जन्म देती है:

  • क्या मामले को दबाया जा रहा है?

  • क्या जांच में जानबूझकर देरी हो रही है?

जनता को जवाब चाहिए, सिर्फ आश्वासन नहीं।


आगे क्या होना चाहिए

यदि सरकार और प्रशासन वास्तव में किसानों के हितैषी हैं, तो:

  • तत्काल जांच शुरू हो

  • सभी लेन-देन की फॉरेंसिक ऑडिट हो

  • जिम्मेदार अधिकारियों को निलंबित किया जाए

  • किसानों को न्याय मिले

बड़े नवापारा सहकारी समिति का यह घोटाला सिर्फ 4 करोड़ रुपये का नहीं है, बल्कि विश्वास, पारदर्शिता और व्यवस्था की साख का मामला है
अगर समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो यह मामला आने वाले समय में और भी बड़े संकट का रूप ले सकता है

अब जरूरत है कि जांच हो, सच सामने आए और दोषियों को सजा मिले, ताकि सहकारी समितियों पर आम लोगों का भरोसा बना रहे।

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