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33 धान खरीदी केंद्रों का बड़ा खुलासा पिछले साल से ज्यादा खरीदी, कुछ जगह दोगुना धान, प्रशासन पर उठे गंभीर सवाल

33 खरीदी केंद्रों में पिछले साल से ज्यादा हो गई धान खरीदी, प्रशासन की मंशा पर फिरा पानी, कुछ केंद्रों में दोगुनी मात्रा में खरीदी – पढ़ें पूरी रिपोर्ट

छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है। राज्य की अर्थव्यवस्था, ग्रामीण जीवन और किसान की आजीविका का सबसे बड़ा आधार धान की खेती ही है। हर साल सरकार द्वारा समर्थन मूल्य पर धान खरीदी की जाती है, ताकि किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिल सके। लेकिन इस व्यवस्था में लगातार गड़बड़ियों, अनियमितताओं और प्रशासनिक लापरवाही के आरोप सामने आते रहे हैं।

इस साल भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला है। जिले के 33 धान खरीदी केंद्रों में पिछले वर्ष की तुलना में कहीं अधिक धान की खरीदी दर्ज की गई है, जबकि प्रशासन की मंशा यह थी कि इस बार खरीदी को सीमित और पारदर्शी बनाया जाए। कई केंद्रों में तो पिछले साल की तुलना में दोगुनी मात्रा में धान खरीदी होना दर्ज किया गया है, जिसने पूरे सिस्टम पर सवालिया निशान लगा दिया है।

 धान खरीदी में केवल बड़े किसान ही परेशान हो रहे हैं। पुराने प्रबंधकों और बिचौलियों को जो काम करना है, वो आसानी से कर रहे हैं। धान खरीदी में कड़ाई के बावजूद पिछले साल की तुलना ज्यादा धान खरीद लिया गया है। 33 केंद्र ऐसे हैं, जहां ज्यादा खरीदी हो गई है। इसमें खरसिया के उपार्जन केंद्रों की संख्या अधिक है।

सरकार ने धान खरीदी को तिलिस्म बना दिया है। एक ओर 21 क्विंटल प्रति एकड़ धान खरीदी का ऐलान किया गया और अब अनावरी के हिसाब से किसी का 17 तो किसी का 18 क्विंटल के हिसाब से टोकन काटा जा रहा है। इतनी कड़ाई के बाद धान की आवक कम होनी चाहिए लेकिन इसका उल्टा हुआ है। 105 में से 33 केंद्र ऐसे हैं जहां पिछले साल से ज्यादा खरीदी हो चुकी है। कुछ तो ऐसे हैं जहां दोगुनी मात्रा में धान खरीदा जा चुका है।

जिले में 105 उपार्जन केंद्रों में धान खरीदा जा रहा है। प्रतिदिन खरीदी गई मात्रच की समीक्षा की जा रही है। इसके बावजूद 33 केंद्रों में प्रशासन की आंखों में धूल झोंककर खरीदी कर ली गई। इसमें कुछ केंद्र ऐसे भी हैं जहां पिछले तीन सालों में गबन के कारण एफआईआर दर्ज की जा चुकी है। उदाहरण के लिए छातामुड़ा केंद्र में 24-25 में 7964 क्विं. धान खरीदी की गई थी।

लेकिन इस बार 10350 क्विं. क्रय किया जा चुका है। करीब डेढ़ गुना धान खरीदा जा चुका है। खरसिया के बड़े देवगांव में गत वर्ष इसी अवधि तक 3800 क्विं. धान खरीदी हुई थी जो इस बार 6838 क्विं. पहुंच चुका है जो तकरीबन दोगुना है। लैलूंगा के बगुडेगा में पिछले साल 8976 क्विं. धान उपार्जन हुआ था जो इस बार 15060 क्विं. हो गया है। ऐसे 33 केंद्र हैं जहां धान खरीदी का आंकड़ा असामान्य है। इसमें से कई दागी समितियां हैं।

खरसिया के 12 केंद्रों ने तोड़े रिकॉर्ड

33 केंद्रों में लैलूंगा का बगुडेगा और खरसिया के हालाहुली, बड़े देवगांव, तुरेकेला व तिउर शामिल हैं। इनका नाम पिछले सालों में फर्जी खरीदी में भी सामने आया था। तुरेकेला और हालाहुली में कई तरह की गड़बडिय़ां हो चुकी हैं जिन पर सहकारिता विभाग कोई कार्रवाई नहीं करता। सांठगांठ करके प्रबंधक नियुक्त किए जाते हैं। बड़े देवगांव में भी जमकर हो रही खरीदी से नोडल अधिकारी पर सवाल उठ रहे हैं। खरसिया के 22 केंद्रों में से 12 में गत वर्ष की तुलना में ज्यादा खरीदी हो चुकी है।


प्रशासन की मंशा और जमीनी हकीकत

इस खरीफ सीजन की शुरुआत से पहले जिला प्रशासन और खाद्य विभाग ने स्पष्ट निर्देश जारी किए थे कि—

प्रशासन का दावा था कि इस बार पिछली गड़बड़ियों से सबक लेते हुए पूरी व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त किया गया है। लेकिन खरीदी के आंकड़ों ने इन दावों की पोल खोल दी। Amar Ujala


33 केंद्रों में कैसे बढ़ गई खरीदी?

आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक जिले के कुल धान खरीदी केंद्रों में से 33 केंद्र ऐसे हैं, जहां पिछले साल की तुलना में इस बार कहीं अधिक धान खरीदी दर्ज हुई है।

यह तब है जब—

ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर यह अतिरिक्त धान आया कहां से?


क्या फिर से सक्रिय हो गए बिचौलिए?

धान खरीदी में बढ़ोतरी के पीछे सबसे बड़ा शक बिचौलियों की सक्रियता को लेकर जताया जा रहा है। ग्रामीण इलाकों से लगातार शिकायतें आ रही हैं कि—

कई किसानों का कहना है कि खरीदी केंद्रों पर उन्हीं लोगों का धान लिया गया, जिनकी पहले से मिलीभगत थी, जबकि वास्तविक जरूरतमंद किसानों को बार-बार चक्कर लगाने पड़े।


कुछ केंद्र क्यों बने ‘हॉटस्पॉट’?

जिन 33 केंद्रों में खरीदी असामान्य रूप से बढ़ी है, उनमें से कई केंद्र पहले भी विवादों में रहे हैं। इन केंद्रों की खास बातें—

सूत्रों की मानें तो कुछ केंद्रों पर तो रातों-रात हजारों क्विंटल धान की एंट्री कर दी गई, जबकि मौके पर उतना धान मौजूद ही नहीं था।


कागजों में बढ़ी पैदावार, खेतों में नहीं

धान खरीदी में बढ़ोतरी को लेकर एक और बड़ा सवाल यह है कि—

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि कागजों में उत्पादन बढ़ाना आसान है, लेकिन वास्तविक उत्पादन में इतनी वृद्धि होना लगभग असंभव है। इसका सीधा मतलब है कि कहीं न कहीं सिस्टम का दुरुपयोग हुआ है।


प्रशासनिक निगरानी पर सवाल

इस पूरे मामले में प्रशासनिक निगरानी भी सवालों के घेरे में है।

यदि जानकारी थी और फिर भी कार्रवाई नहीं हुई, तो यह लापरवाही नहीं बल्कि संरक्षण की श्रेणी में आता है।


ईमानदार किसानों के साथ अन्याय

धान खरीदी की इस गड़बड़ी का सबसे बड़ा नुकसान ईमानदार किसानों को उठाना पड़ रहा है।

जब बिचौलिये और फर्जी एंट्री करने वाले आसानी से धान बेच रहे हों, तो वास्तविक किसान खुद को ठगा हुआ महसूस करता है।


सरकार की साख पर असर

छत्तीसगढ़ सरकार ने हमेशा खुद को किसान हितैषी सरकार बताया है। धान खरीदी उसकी सबसे बड़ी योजनाओं में से एक है। लेकिन ऐसी गड़बड़ियां—

यदि समय रहते इन मामलों की जांच नहीं हुई, तो इसका राजनीतिक असर भी देखने को मिल सकता है।


जांच की मांग तेज

अब यह मांग जोर पकड़ने लगी है कि—

कई किसान संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जिला प्रशासन से लिखित शिकायत भी की है।


क्या बोले जिम्मेदार अधिकारी?

इस मामले में जिम्मेदार अधिकारी औपचारिक बयान देते नजर आ रहे हैं। उनका कहना है कि—

हालांकि अभी तक कोई ठोस जांच या कार्रवाई सामने नहीं आई है।


आगे की राह क्या?

धान खरीदी व्यवस्था को सुधारने के लिए जरूरी है कि—

जब तक सख्ती नहीं होगी, तब तक हर साल यही कहानी दोहराई जाती रहेगी।

33 धान खरीदी केंद्रों में पिछले साल से अधिक खरीदी होना केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह पूरे सिस्टम की कमजोरी को उजागर करता है। प्रशासन की मंशा चाहे जितनी भी अच्छी हो, यदि जमीनी स्तर पर ईमानदारी नहीं होगी, तो हर योजना का यही हाल होगा।

अब जरूरत है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच हो, ताकि—

जब तक सच्चाई सामने नहीं आएगी, तब तक यह सवाल बना रहेगा—
आखिर इतना ज्यादा धान आया कहां से?

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