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27 लाख की ठगी परिचित ने प्रधान पाठक के नाम पर निकलवाया लोन, भरोसे को बनाया हथियार

ये भी गजब है परिचित ने प्रधान पाठक के नाम से निकलवाया लोन और डकारे 27 लाख रुपये

भरोसे की आड़ में हुआ बड़ा वित्तीय धोखा, शिक्षा जगत में मचा हड़कंप

आज के डिजिटल और बैंकिंग युग में जहां एक ओर लोन लेना आसान हुआ है, वहीं दूसरी ओर धोखाधड़ी के मामले भी तेजी से बढ़े हैं। खासकर जब कोई परिचित, रिश्तेदार या भरोसेमंद व्यक्ति ही विश्वासघात कर दे, तो पीड़ित के लिए न केवल आर्थिक बल्कि सामाजिक और मानसिक संकट भी खड़ा हो जाता है। ऐसा ही एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां एक प्रधान पाठक (हेडमास्टर) के नाम पर उसके ही परिचित ने 27 लाख रुपये का लोन निकलवाकर हड़प लिया

यह मामला न सिर्फ व्यक्तिगत धोखाधड़ी का उदाहरण है, बल्कि यह भी दिखाता है कि किस तरह बैंकिंग सिस्टम की खामियों और लोगों की जानकारी की कमी का फायदा उठाकर अपराधी लाखों रुपये डकार जाते हैं।Amar Ujala


मामला क्या है?

जानकारी के अनुसार, पीड़ित व्यक्ति एक शासकीय विद्यालय में प्रधान पाठक के पद पर पदस्थ है। आरोपी उसका पुराना परिचित था, जिस पर उसने आंख मूंदकर भरोसा किया। आरोपी ने खुद को वित्तीय मामलों का जानकार बताते हुए कहा कि वह प्रधान पाठक को किसी योजना या जरूरत के लिए 27 लाख बैंक से लोन दिलाने में मदद करेगा

धीरे-धीरे आरोपी ने प्रधान पाठक से आधार कार्ड, पैन कार्ड, बैंक पासबुक, सैलरी स्लिप और सिग्नेचर से जुड़े दस्तावेज हासिल कर लिए। भरोसे में आकर प्रधान पाठक ने इन दस्तावेजों का गलत इस्तेमाल होने की आशंका तक नहीं की।

शासकीय स्कूल के प्रधान पाठक को परिचित व्यक्ति द्वारा उसके नाम पर अलग-अलग बैंकों से तकरीबन 27 लाख रूपए लोन निकलवा कर राशि गबन कर लेने का मामला प्रकाश में आया है। लोन की किस्त नहीं पटने से परेशान होकर पीडि़त ने थाने की शरण ली है। पुलिस ने प्रार्थी की रिपोर्ट पर आरोपी के विरूद्ध धोखाड़ी का जुर्म दर्ज कर मामले को जांच में लिया है। उक्त वाकया खरसिया थाना क्षेत्र का है।

इस संबंध में मिली जानकारी के अनुसार खरसिया थानांतर्गत ग्राम बाम्हनपाली निवासी लोकनाथ रात्रे घरघोड़ा ब्लाक के ग्राम पानीखेत के प्राथमिक शाला कन्या आश्रम में प्रधान पाठक के पद पर पदस्थ है। लोकनाथ रात्रे ने खरसिया थाने में लिखित शिकायत दर्ज कराते हुए बताया कि मेरे परिचित सक्तीजिले के मालखरौदा थानांतर्गत ग्राम सपिया निवासी विद्याचरण गोरे मई 2024 में अपने मामा गिरीश कुमार जोल्हे से उसका परिचय करवाया। इस दौरान गिरीश जोल्हे ने उसे अपने लोन संबंधी कार्य के बारे में बताया और कहा कि, मैं आपके नाम पर लोन निकलवाउंगा और उसकी सारी किस्तें मैं स्वयं अदा करूंगा और इसके एवज में आपको आपके लोन राशि का 35 प्रतिशत राशि दूंगा।

उस पर विश्वास करते हुए लोकनाथ ने अपना पेन कार्ड व छ: महीने का ऑनलाईन पे-स्लिप सहित अन्य आवश्यक दस्तावेज उसे दे दिये। इसके आधार पर उसने अलग-अलग बैंकों से लोन के फार्म लाकर लोकनाथ से हस्ताक्षर करवा लिये। लोकनाथ रात्रे ने बताया कि उसने चोला मण्डलम शाखा रायगढ़ से 6 लाख 40 हजार रूपये, आईसीआईसीआई बैंक शाखा रायगढ़ से चार लाख रूपये, एक्सिस बैंक शाखा रायगढ़ से 6 लाख 65 हजार रूपयभारतीय स्टेट बैंक शाखा कोड़ातराई से 10 लाख 20 हजार रूपय इस तरह कुल 27 लाख 25 हजार रूपये लोन निकलवा लिया।

लोन प्रदान करने के संबंध में प्रोसेसिंग चार्ज, इंश्योरेंस एवं अन्य जो चार्ज लगता है उसे कटौती करने के उपरांत बचत राशि 20 लाख 76 हजार रूपये लोकनाथ के खाते में आने के बाद गिरिश जोल्हे ने किश्तों में उक्त राशि को अपने खाते में ट्रांसफर करा लिया। उक्त रकम लेने के उपरांत सभी लोन की किस्तों का भुगतान लगभग दो से तीन माह तक उसके द्वारा अदा किया गया उसके बाद से उसने लोन की किस्तें अदा करना बंद कर दिया।

किस्तों का भुगतान नहीं होने पर बैंक वाले जब लोकनाथ पर रकम जमा करने दबाव बनाना शुरू किये तब उसने गिरिश से फोन पर संपर्क किया। गिरिश ने आश्वस्त किया कि वह किश्त का भगतान कर देगा।ऐसे में एक बार फिर लोकनाथ उस पर विश्वास कर शांत बैठ गया। इधर किस्त जमा नहीं होने पर फिर से बैंक के अधिकारी उसे भगुतान करने को कहे तब लाकनाथ परेशान होकर गिरीश कुमार जोल्हे से वाट्सएप पर चैटिंग में बात की जिसमें उसने किस्त का भुगतान कर देने एवं लोन का पूरा पैसा पटाकर लोन खत्म कने के संबंध में आश्वासन देता रहा है लेकिन एक भी किश्त जमा नहीं की।

इस पर आखिरकार लोकनाथ रात्रे में खरसिया थाने में उसके विरूद्ध रिपोर्ट दर्ज कराई। पुलिस ने गिरिश जोल्हे के खिलाफ भादवि की धारा 420 के तहत अपराध पंजीबद्ध कर मामले की जांच प्रारंभ कर दी है।


ऐसे निकाला गया 27 लाख का लोन

आरोपी ने इन दस्तावेजों के आधार पर अलग–अलग माध्यमों से करीब 27 लाख रुपये का लोन निकाल लिया।

लोन की पूरी रकम आरोपी ने अपने खाते या किसी अन्य सहयोगी के खातों में ट्रांसफर कर ली। हैरानी की बात यह रही कि लोन की ईएमआई प्रधान पाठक के खाते से कटने लगी, लेकिन आरोपी रकम लेकर फरार हो गया।


कैसे खुला धोखाधड़ी का राज?

इस पूरे फर्जीवाड़े का खुलासा तब हुआ जब

शुरुआत में प्रधान पाठक को लगा कि यह कोई तकनीकी गलती होगी, लेकिन जब बैंक जाकर जानकारी ली गई तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। उनके नाम पर 27 लाख रुपये का लोन बकाया दिखाया गया।


पीड़ित की हालत: आर्थिक और मानसिक तनाव

एक शिक्षक, जो पूरी जिंदगी ईमानदारी से नौकरी करता रहा, अचानक खुद को

मानसिक तनाव इतना बढ़ गया कि परिवार पर भी इसका असर पड़ा। बच्चों की पढ़ाई, घर का खर्च और सामाजिक प्रतिष्ठा—सब कुछ खतरे में पड़ गया।


पुलिस में दर्ज हुई शिकायत

सच्चाई सामने आने के बाद प्रधान पाठक ने

पुलिस ने प्राथमिक जांच में पाया कि दस्तावेजों का दुरुपयोग कर लोन लिया गया है। अब बैंक रिकॉर्ड, कॉल डिटेल और ट्रांजैक्शन हिस्ट्री की जांच की जा रही है।


बैंकिंग सिस्टम पर उठे सवाल

इस पूरे मामले ने बैंकिंग व्यवस्था पर भी कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं:

  1. बिना सही सत्यापन के इतना बड़ा लोन कैसे स्वीकृत हुआ?

  2. क्या बैंक ने स्वयं प्रधान पाठक की मौजूदगी में प्रक्रिया पूरी की?

  3. डिजिटल सिग्नेचर और ओटीपी का इस्तेमाल किस तरह किया गया?

यदि बैंक स्तर पर सख्ती बरती जाती, तो शायद यह धोखाधड़ी रोकी जा सकती थी।


साइबर फ्रॉड और पहचान की चोरी का मामला

यह केस केवल धोखाधड़ी नहीं, बल्कि आइडेंटिटी थेफ्ट (पहचान की चोरी) का भी उदाहरण है। आज के समय में


कानूनी प्रावधान क्या कहते हैं?

भारतीय कानून के तहत ऐसे मामलों में आरोपी पर

सजा में जुर्माना और कई साल की जेल का प्रावधान है।


शिक्षकों और कर्मचारियों के लिए सबक 27 लाख

यह घटना खासतौर पर शासकीय कर्मचारियों और शिक्षकों के लिए चेतावनी है:

भरोसा करें, लेकिन आंख बंद करके नहीं।


कैसे बचें ऐसे धोखाधड़ी से?

  1. अपने दस्तावेज सुरक्षित रखें

  2. किसी एजेंट या परिचित पर पूरी तरह निर्भर न रहें

  3. बैंक से जुड़ा हर काम खुद सत्यापित करें

  4. संदिग्ध कॉल या मैसेज पर तुरंत बैंक और पुलिस को सूचना दें

  5. डिजिटल जागरूकता बढ़ाएं


समाज के लिए चेतावनी

यह मामला केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि समाज को आईना दिखाता है कि आज सबसे बड़ा खतरा बाहर नहीं, बल्कि भीतर के भरोसे से है। जब परिचित ही धोखा देने लगें, तो सतर्कता ही सबसे बड़ा बचाव है।

प्रधान पाठक के नाम पर 27 लाख रुपये का लोन निकालकर हड़प लेने का यह मामला न सिर्फ चौंकाने वाला है, बल्कि बेहद गंभीर भी है। यह घटना हमें सिखाती है कि

“अति-विश्वास ही सबसे बड़ा जोखिम है।”

जरूरत है कि हम जागरूक बनें, सिस्टम से सवाल पूछें और अपने अधिकारों की रक्षा करें, ताकि मेहनत की कमाई किसी ठग की जेब में न जाए।

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