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“21 क्विंटल की जगह अनावरी खरीदी किसानों का फूटा गुस्सा, 5 बड़ी वजहों से सड़क पर उतरे, किया चक्काजाम”

21 क्विंटल नहीं, अनावरी के हिसाब से खरीदी किसानों का फूटा गुस्सा, सड़क पर उतरे अन्नदाता, किया चक्काजाम

छत्तीसगढ़ को देश का धान कटोरा कहा जाता है। यहां की अर्थव्यवस्था, ग्रामीण जीवन और सामाजिक ताना-बाना काफी हद तक किसानों पर निर्भर है। सरकार हर साल समर्थन मूल्य पर धान खरीदी का दावा करती है और किसानों को राहत देने की बातें करती है, लेकिन जमीनी हकीकत कई बार इन दावों की पोल खोल देती है। ऐसा ही एक मामला सामने आया है, जहां 21 क्विंटल प्रति एकड़ खरीदी के बजाय अनावरी (अनुमानित उपज) के हिसाब से धान खरीदे जाने से किसानों में भारी नाराजगी फैल गई। नाराज किसानों ने सड़क पर उतरकर चक्काजाम किया और प्रशासन के खिलाफ जमकर नारेबाजी की।

यह मामला केवल धान खरीदी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह किसानों के अधिकार, सरकारी व्यवस्था की पारदर्शिता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की अनदेखी का प्रतीक बन गया है।


क्या है पूरा मामला?

सरकार द्वारा धान खरीदी के लिए सामान्य तौर पर 21 क्विंटल प्रति एकड़ का मानक तय किया जाता है। इसका उद्देश्य यह है कि किसान को उसकी वास्तविक मेहनत और लागत के अनुसार उचित भुगतान मिल सके। लेकिन इस बार कई खरीदी केंद्रों पर किसानों को यह कहकर रोका गया कि उनकी फसल अनावरी के अनुसार ही खरीदी जाएगी।

अनावरी का मतलब होता है – खेत में खड़ी फसल का अनुमानित उत्पादन। यह अनुमान अक्सर पटवारी या संबंधित कर्मचारी द्वारा लगाया जाता है, जो कई बार वास्तविक उत्पादन से काफी कम होता है।Kelo Pravah

 धान खरीदी की पूरी रूपरेखा ही बदल चुकी है। छोटे किसानों से खरीदी में अनावरी रिपोर्ट की अनदेखी की गई लेकिन अब बड़े किसानों को इसका सामना करना पड़ रहा है। 21 क्विंटल के बजाय कहीं 16 तो कहीं 17 क्विंटल धान खरीदी करने का फरमान सुनाया गया है। इसे लेकर अब बवाल होने लगा है। सोमवार को टेंडा नवापारा में किसानों ने चक्काजाम कर दिया। धान की फसल के लिए भरपूर पानी की जरूरत होती है।

समय पर अच्छी बारिश और सिंचाई के साधन हों तो धान का उत्पादन बहुत अधिक होता है। सरकार ने प्रति एकड़ 21 क्विंटल धान खरीदी का ऐलान किया था। रायगढ़ जिले में पटवारियों को अनावरी के हिसाब से ही समिति में धान खरीदी की एंट्री करने के निर्देश हैं। टोकन काटने में अनावरी के हिसाब से ही मात्रा ली जाती है।

मतलब किसान का उत्पादन भले ही 18-19 क्विंटल हो रहा हो, यदि अनावरी में 16 क्विंटल डाला गया है तो उसी अनुपात में टोकन मिलेगा। सोमवार को इसी बात पर टेण्डा नवापारा में हंगामा हो गया। अव्यवस्था, अनियमितता और प्रति एकड़ धान खरीदी में कथित भेदभाव को लेकर क्षेत्र के किसानों का आक्रोश फूट पड़ा। किसानों ने धान उपार्जन केंद्र के सामने ही मुख्य मार्ग पर चक्काजाम कर आर्थिक नाकेबंदी की।

किसानों का कहना है कि धान उपार्जन केंद्र नवापारा टेण्डा में 26 दिसंबर से प्रति एकड़ केवल 17 क्विंटल धान ही खरीदा जा रहा है, जबकि शासन द्वारा पूर्व से ही प्रति एकड़ 21 क्विंटल धान खरीदी का आदेश है। किसानों ने बताया कि 26 दिसंबर से पहले छोटे किसानों का धान 21 क्विंटल प्रति एकड़ के मान से खरीदा गया, लेकिन बड़े किसानों के मामले में अलग नियम लागू हैं।

बड़े किसानों को 15 दिसंबर तक टोकन भी जारी नहीं किया गया और अब टोकन दे रहे हैं तो उनसे प्रति एकड़ केवल 17 क्विंटल धान ही खरीदा जा रहा है। राजस्व विभाग ने 5 एकड़ एवं 10 एकड़ से अधिक भूमि वाले किसानों का टोकन कटने से पूर्व तथा बाद में भी भौतिक सत्यापन कर पंचनामा तैयार किया है। किसान के पास धान होने के बावजूद धान खरीदी की लिमिट कम कर दी गई है। आक्रोशित किसानों ने प्रशासन से 21 क्विंटल प्रति एकड़ धान खरीदी करने और उपार्जन केंद्र में अनियमितताओं पर कार्रवाई की मांग की।

जमरगी डी में भी हो चुका है विवाद

इससे पहले धरमजयगढ़ तहसील के जमरगी-डी धान उपार्जन केंद्र में भी हंगामा हो चुका है। यहां किसानों को 21 क्विंटल के हिसाब से टोकन जारी होने के बाद भी केवल 18 क्विंटल धान खरीदा जा रहा था। वहां भी आक्रोशित किसानों ने धान से लदे अपने वाहन मंडी परिसर के बाहर खड़े कर दिए और ऐलान किया कि जब तक पूरे 21 क्विंटल धान की खरीदी नहीं होगी, तब तक वे धान नहीं बेचेंगे। खरीदी केंद्र दीवार पर 18 क्विंटल का पत्र चिपका दिया गया। आदेश पर किसी भी सक्षम अधिकारी के हस्ताक्षर नहीं थे। बिना हस्ताक्षर और अधिकृत आदेश के इस तरह का फरमान दिया जा रहा है जिससे माहौल खराब हो रहा है।

कापू केंद्र में गाली-गलौज

केवल इन दोनों केंद्रों में ही नहीं कापू में भी स्थिति सही नहीं है। जिले में सबसे ज्यादा धान खरीदने वाले केंद्र में भी 21 क्विंटल खरीदी नहीं हो रही है। पिछले दिनों किसानों ने विरोध किया तो केंद्र में तनाव का माहौल हो गया। बताया जा रहा है कि नोडल अधिकारी की मौजूदगी में गालीगलौज भी की गई। इस पर जिला प्रशासन भी कोई कार्रवाई नहीं कर सका।

किसानों का आरोप है कि:

इससे किसानों को सीधा आर्थिक नुकसान हुआ।


किसानों का गुस्सा क्यों फूटा?

किसानों का कहना है कि उन्होंने:

सब कुछ महंगे दामों पर खरीदा। खेती की लागत लगातार बढ़ती जा रही है, लेकिन जब फसल बेचने की बारी आती है, तब नियम बदल दिए जाते हैं।

किसानों के अनुसार:

इस भेदभाव से किसानों में आक्रोश बढ़ता गया।


चक्काजाम की नौबत कैसे आई?

लगातार शिकायतों के बावजूद जब:

तो किसानों ने मजबूर होकर सड़क पर उतरने का फैसला किया

सुबह-सुबह बड़ी संख्या में किसान:

के साथ मुख्य सड़क पर पहुंच गए और चक्काजाम कर दिया।

सड़क जाम होते ही:

लेकिन किसानों का कहना था कि जब तक उनकी बात नहीं सुनी जाएगी, वे सड़क से नहीं हटेंगे।


किसानों की प्रमुख मांगें

चक्काजाम के दौरान किसानों ने साफ शब्दों में अपनी मांगें रखीं:

  1. 21 क्विंटल प्रति एकड़ के हिसाब से धान खरीदी की जाए

  2. अनावरी के नाम पर खरीदी कम करना तुरंत बंद किया जाए

  3. जिन किसानों का धान लौटाया गया है, उसकी दोबारा खरीदी हो

  4. दोषी कर्मचारियों और अधिकारियों पर कार्रवाई की जाए

  5. खरीदी प्रक्रिया में पारदर्शिता लाई जाए

किसानों का कहना था कि यह लड़ाई सिर्फ उनकी नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के हक की है।


प्रशासन की प्रतिक्रिया

चक्काजाम की सूचना मिलते ही:

मौके पर पहुंचे और किसानों से बातचीत शुरू की।

अधिकारियों ने किसानों को आश्वासन दिया कि:

हालांकि किसानों का कहना था कि केवल आश्वासन से पेट नहीं भरता, उन्हें लिखित और ठोस निर्णय चाहिए।


अनावरी प्रणाली पर सवाल

इस पूरे विवाद के बाद अनावरी प्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

किसानों का कहना है कि:

विशेषज्ञों का भी मानना है कि जब सरकार ने 21 क्विंटल प्रति एकड़ का नियम तय किया है, तो अनावरी के आधार पर खरीदी करना खुद सरकार की नीति के खिलाफ है।


राजनीतिक बयानबाजी भी तेज

किसानों के आंदोलन के बाद राजनीतिक दल भी सक्रिय हो गए।
विपक्ष ने आरोप लगाया कि:

वहीं सत्तापक्ष का कहना है कि:

लेकिन सवाल यह है कि जब किसान सड़क पर बैठा है, तो जिम्मेदारी किसकी है?


ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर

धान खरीदी में गड़बड़ी का सीधा असर:

पर पड़ता है।

अगर किसान को समय पर और पूरा पैसा नहीं मिलेगा, तो:

इसलिए यह मुद्दा सिर्फ किसानों का नहीं, बल्कि पूरे समाज का है।


पहले भी हो चुके हैं ऐसे मामले

यह पहली बार नहीं है जब:

जैसी घटनाएं सामने आई हों।

हर साल खरीदी के मौसम में:

जैसी शिकायतें सामने आती हैं।

इससे साफ है कि सिस्टम में सुधार की सख्त जरूरत है।


समाधान क्या हो सकता है?

विशेषज्ञों और किसान संगठनों के अनुसार:

  1. खरीदी के नियम स्पष्ट और समान हों

  2. अनावरी की प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बनाया जाए

  3. डिजिटल रिकॉर्ड और निगरानी बढ़ाई जाए

  4. किसानों की शिकायतों का त्वरित समाधान हो

  5. खरीदी केंद्रों पर किसानों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए

जब तक ये सुधार नहीं होंगे, ऐसे आंदोलन बार-बार होते रहेंगे।

21 क्विंटल नहीं, अनावरी के हिसाब से खरीदी का मामला एक बार फिर यह साबित करता है कि योजनाएं चाहे कितनी भी अच्छी क्यों न हों, अगर उनका क्रियान्वयन सही नहीं होगा, तो किसान सड़कों पर उतरने को मजबूर होंगे।

किसान सिर्फ अपनी मेहनत का पूरा मूल्य चाहता है, कोई विशेष एहसान नहीं। अगर समय रहते इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं किया गया, तो आने वाले दिनों में ऐसे आंदोलन और तेज हो सकते हैं।

सरकार और प्रशासन को चाहिए कि वे इस गुस्से को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या न मानें, बल्कि इसे किसानों की पीड़ा की आवाज समझें और ठोस कदम उठाएं।

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