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2025 अडाणी पावर प्लांट का विस्तार 175 हेक्टेयर भूमि अधिग्रहण, प्रभाव और भविष्य

2025 अडाणी पावर प्लांट का विस्तार भारत की ऊर्जा ज़रूरत से भूमि अधिग्रहण तक — एक गहन समीक्षा

नई कोयला खदानों के शुरू होने के साथ रायगढ़ में स्टील और पावर सेक्टर में हलचल बढ़ गई है। कई नए प्लांट भी आ रहे हैं और पुराने संयंत्रों का विस्तार हो रहा है। रायगढ़ से करीब 25 किमी दूरी पर स्थित अडाणी पावर प्लांट का भी विस्तार होने वाला है। इसके लिए तीन गांवों में करीब 175 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण हो रहा है। रायगढ़ शहर के चारों ओर पावर प्लांटों का घेरा तैयार हो रहा है।

हर हाईवे पर एक बड़ा प्लांट स्थापित हो रहा है। हाल ही में वीसा पावर की जमीनें टोरेंट पावर ने खरीद ली हैं। अब वहां पावर प्लांट लगेगा। इसी तरह अडाणी पावर ने भी बड़े भंडार स्थित प्लांट का विस्तार करने का प्रोजेक्ट प्रारंभ कर दिया है। छग शासन ने अवंता ग्रुप को बड़े भंडार में 1200 मेगावाट का प्लांट लगाने के लिए एमओयू किया था।

कोरबा वेस्ट पावर प्लांट का अधिग्रहण बाद में अडाणी समूह ने कर लिया। अभी तक यहां केवल 600 मेगावाट ही ऑपरेशनल हो सका है। अब अडाणी पावर बचे हुए 600 मेगावाट की जगह पर 800 मेगावाट के दो नए यूनिट लगाना चाह रहा है। इसके बाद पावर प्लांट की क्षमता 2200 मेगावाट हो जाएगी। अडाणी ग्रुप यहां अल्ट्रा सुपर क्रिटिकल थर्मल पावर प्लांट स्थापित करने जा रहा है जिसके लिए राज्य शासन ने अनुमति दे दी है।

केंद्र सरकार ने 28 नवंबर 2024 को विस्तारण की अनुमति दी थी। जनवरी 2025 में पर्यावरणीय मंजूरी भी मिल चुकी है। राज्य शासन ने कंपनी को जमीन देने की प्रक्रिया प्रारंभ कर दी है। उद्योग विभाग के माध्यम से बरपाली में 40.372 हे., कोतमरा 116.344 हे. और सरवानी में 19.139 हे. कुल 175.855 हे. निजी भूमि ली जा रही है। शासकीय भूमि भी करीब 20 हे. अधिग्रहित की जाएगी। इन गांवों में जमीन की खरीदी-बिक्री, डायवर्सन, बटांकन पर रोक लगाई गई है।

दो गुना हो जाएगी कोयला खपत
वर्तमान में अडाणी पावर बड़े भंडार में 600 मेगावाट के दो यूनिट प्रस्तावित थे। इसमें से एक यूनिट के स्थान पर 1600 मेगावाट का प्लांट लगेगा। अभी प्लांट में 3.25 मिलियन टन कोयले की सालाना खपत हो रही है। विस्तार होने के बाद करीब 6.6 मिलियन टन कोयला लगेगा जो ओडिशा के बिजाहन माइंस से लाए जाने की योजना है। फ्लाई एश जेनरेशन भी करीब तीन गुना हो जाएगा। वर्तमान में करीब 12 लाख टन एश उत्सर्जित हो रहा है जो करीब 34 लाख टन हो जाएगा। महानदी से पानी लिया जाएगा।

विरोध की चिंगारी भडक़ेगी
वर्तमान में रायगढ़ जिले में किसी भी उद्योग के लिए भूमि अधिग्रहण का नाम सुनते ही स्थानीय स्तर पर आक्रोश भडक़ रहा है। बड़े भंडार क्षेत्र के तीन और गांवों में करीब 425 एकड़ निजी जमीन लिए जाने की जानकारी सामने आते ही फिर से हंगामा होना तय है। रायगढ़ शहर में पावर प्लांटों के कारण प्रदूषण स्तर बढ़ता ही जाएगा। इसे रोकना नामुमकिन है।


 भारत में ऊर्जा की मांग और थर्मल पावर की भूमिका

भारत एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था है जहाँ उद्योग, कृषि, सेवा, घरेलू और तकनीकी उपयोग के कारण ऊर्जा की मांग निरंतर ऊँची होती जा रही है। विद्युत उत्पादन में थर्मल ऊर्जा (विशेषकर कोयला आधारित) आज भी देश की ऊर्जा का बड़ा हिस्सा देती है। हालांकि नवीकरणीय ऊर्जा की दिशा में भी तेजी है, थर्मल पावर अभी भी बेस‑लोड बिजली (रात में या मौसम‑अनुकूलता के बावजूद स्थिर उत्पादन) प्रदान करती है।

निजी क्षेत्र की कंपनियों का निवेश भारत में इस मांग को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। बड़े ठेकेदार और पावर उत्पादक कंपनियाँ जैसे अडाणी पावर, बड़े पैमाने पर पावर प्लांट का विस्तार कर रही हैं ताकि बिजली ग्रिड की स्थिरता बनी रहेऔर कृषि, उद्योग व घरेलू उपभोक्ताओं को निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित रहे।


 अडाणी पावर लिमिटेड का परिचय और विस्तार रणनीति

अडाणी पावर लिमिटेड भारत में एक प्रमुख निजी थर्मल बिजली कंपनी है। कंपनी ने अपने परिचालन को व्यापक स्तर पर बढ़ाया है और लक्ष्य रखा है कि वह आने वाले वर्षों में अपनी उत्पादन क्षमता में मोटे तौर पर कई गुना वृद्धि कर सके।

हाल ही में अडाणी पावर ने कई अधिग्रहण और विस्तार योजनाओं की घोषणा की है। उदाहरण के लिए, कंपनी ने 600 मेगावाट की क्षमता वाले विदर्भ पावर लिमिटेड को लगभग 4000 करोड़ रुपये में अधिग्रहित किया और अपनी कुल उत्पादन क्षमता को 18,150 मेगावाट कर दिया है। इस कदम के साथ ही कंपनी 2030 तक अपनी कुल क्षमता को 30,670 मेगावाट तक ले जाने के उद्देश्य को और मजबूती दे रही है। इसके अलावा कंपनी कई थर्मल पावर संयंत्रों के लिए विस्तार योजनाओं पर काम कर रही है, जिसमें छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में नए या विस्तारित प्रोजेक्ट शामिल हैं।

ये विस्तार केवल उत्पन्न क्षमता बढ़ाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा और स्थिर शक्ति आपूर्ति सुनिश्चित करने वाले प्रोजेक्ट भी हैं, जो कि भारत के ‘बिजली फॉर ऑल’ विज़न का हिस्सा हैं।


 भूमि अधिग्रहण क्या है और क्यों ज़रूरी है?

एक बड़े पावर प्लांट के लिए पर्याप्त भूमि की ज़रूरत होती है, न सिर्फ संयंत्र निर्माण के लिए बल्कि कोयला स्टॉकयार्ड, पानी स्रोत के पास स्थान, कच्चा माल भंडारण, ट्रांसमिशन लाइनों और सुरक्षा क्षेत्र के लिए भी ज़मीन आवश्यक होती है।

भारत में भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया आम तौर पर संबंधित केंद्र या राज्य सरकार द्वारा “सार्वजनिक उपयोग” के उद्देश्य से की जाती है। इस प्रक्रिया में प्रभावित भूमि मालिकों को मुआवज़ा मिलता है और फिर भूमि को परियोजना कार्यान्वयन के लिए सौंपा जाता है।

भू‑अधिग्रहण के पीछे मुख्य तर्क यह है कि बड़े बुनियादी ढांचे जैसे बिजली संयंत्र सार्वजनिक हित में हैं क्योंकि वे ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक विकास को बढ़ावा देते हैं। हालांकि दलील यह भी है कि निजी कंपनियों को दिए जाने वाले अत्यंत लाभकारी सौदे कभी‑कभी स्थानीय हितों से विपरीत हो सकते हैं।


 भूमि अधिग्रहण में विवाद कैसे उत्पन्न होते हैं?

भू‑अधिग्रहण के दौरान नियोजन और निष्पादन के बीच अक्सर अंतर उत्पन्न हो जाता है।

 स्थानीय किसानों और समुदायों की प्रतिक्रिया

कई किसान और स्थानीय समुदाय महसूस करते हैं कि भूमि मूल्य का सही मुआवज़ा नहीं मिला या उनकी सहमति के बिना भूमि के हस्तांतरण की प्रक्रिया की गई। भूमि उनके जीवन और आजीविका का मुख्य आधार होती है, और इसके बिना उनका सामाजिक तथा आर्थिक जीवन प्रभावित होता है।

 राजनैतिक आरोप और प्रतियाचरण

जहाँ एक ओर सरकारें भूमि उपलब्ध कराकर निवेश और उद्योग को आकर्षित करने के पक्ष में हैं, वहीं विपक्ष इसको लाभ‑प्रद सौदा के रूप में प्रस्तुत करता है। उदाहरण के तौर पर, बिहार में अडाणी पावर के लिए भूमि को प्रति वर्ष प्रतीकात्मक ₹1 की दर पर 33 वर्ष के लिए पट्टे पर देने को लेकर राजनैतिक विवाद उठा, जिसमें दावा किया गया कि स्थानीय लोगों को उचित मुआवज़ा नहीं दिया गया। हालांकि राज्य सरकार ने कहा कि यह पट्टा एक प्रतिस्पर्धात्मक बोली प्रक्रिया के माध्यम से दिया गया और प्रक्रिया मान्य थी। The Economic Times

इस तरह के विवाद तब और अधिक जटिल हो जाते हैं जब बड़े पैमाने पर भूमि को निजी उपयोग के लिए सरकार की ओर से दी जाती है — विशेष रूप से तब जब स्थानीय समुदायों को लगता है कि लाभ केवल बड़ी कंपनियों को मिल रहा है, न कि आम जनता को।


 भूमि अधिग्रहण पर पर्यावरणीय चिंताएँ

पावर संयंत्रों के विस्तार के लिए भूमि हस्तांतरण के दौरान पर्यावरणीय चिंताएँ भी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

उदाहरण के तौर पर, असम के कुछ हिस्सों में देखा गया है कि森林 भूमि को थर्मल पावर परियोजना के लिए सौंपा गया और स्थानीय समुदायों ने आरोप लगाया कि यह अवैध रूप से किया गया, क्योंकि वहाँ पहले से ही वन अधिकार अधिनियम के तहत अधिकार संरक्षित थे। इस तरह के मामलों में वन संरक्षण कानून और स्थानीय समुदायों के अधिकारों का उल्लंघन होने की बात उठती है, जिससे विवाद और तीव्र हो जाता है।

पावर प्लांटों के संचालन के दौरान कोयला जलाने से होने वाला प्रदूषण, जल स्रोतों पर दबाव और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन जैसी चुनौतियाँ भी बहस का विषय बनती हैं।


भूमि अधिग्रहण का सामाजिक‑आर्थिक प्रभाव

भूमि का अधिग्रहण और बड़े पावर प्लांट का निर्माण स्थानीय अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव डालता है:

 सकारात्मक प्रभाव

 नकारात्मक प्रभाव

इन दोनों पहलुओं का तुलनात्मक विश्लेषण करना आवश्यक है ताकि निर्णय संतुलित और सभी हितधारकों की आवाज़ को ध्यान में रखकर लिए जाएँ।


 सरल शब्दों में भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया

भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया में आम तौर पर ये चरण शामिल होते हैं:

  1. परियोजना की पहचान

  2. सरकार द्वारा भूमि की ज़रूरत घोषित करना

  3. प्रभावित भूमि मालिकों की पहचान और सूचित करना

  4. मुआवज़े का निर्धारण और भुगतान

  5. भू‑स्वामियों की सहमति या विधिक प्रक्रिया

  6. भूमि का कब्ज़ा और परियोजना कार्यान्वयन

इन चरणों में पारदर्शिता और विधि‑अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए कई कानून और शासन‑प्रक्रियाएँ उत्प्रेरक बनती हैं।


 भू‑अधिग्रहण और भारत का ऊर्जा भविष्य

अडाणी पावर जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स का विस्तार भारत के ऊर्जा लक्ष्यों के अनुरूप है। देश को अधिक विश्वसनीय, सस्ती और दूरगामी ऊर्जा की ज़रूरत है, और निजी क्षेत्र इसे पूरा करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

हालाँकि भूमि अधिग्रहण एक संवेदनशील और जटिल मुद्दा है, क्योंकि यह स्थानीय समुदायों के जीवन, पर्यावरणीय स्थिरता और सामाजिक हितों को सीधा प्रभावित करता है। इसलिए आवश्यक है कि भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया पारदर्शी, न्यायसंगत और सभी हितधारकों की सहमति के साथ हो। सरकार, कंपनियाँ और समुदाय मिलकर उस दिशा में प्रयास करें जिससे विकास और सामाजिक न्याय दोनों संतुलित रहें।

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