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“5 बड़ी वजहें: क्यों मितानिन संग की अनिश्चितकालीन हड़ताल ने रायगढ़ की स्वास्थ्य सेवाओं को हिला दिया”

“मितानिन संग की अनिश्चितकालीन हड़ताल जारी — रायगढ़ में राजधानी जाने से रोकी गईं स्वास्थ्य सहायक महिलाएँ”

छत्तीसगढ़ की जनस्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ मानी जाने वाली मितानिनें (स्वास्थ्य सहयोगी महिलाएँ) इन दिनों आंदोलनरत हैं। राज्यभर में मितानिन संग (Mitanin Sangh) ने अपनी मांगों को लेकर अनिश्चितकालीन हड़ताल का ऐलान किया है। रायगढ़ जिले में भी इनकी भागीदारी जोशपूर्ण रही, लेकिन जब वे राजधानी रायपुर में मुख्यमंत्री आवास का घेराव करने निकलीं, तो पुलिस प्रशासन ने उन्हें रायगढ़ में ही रोक दिया। यह स्थिति स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था को प्रभावित कर रही है, क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में दवाओं और प्राथमिक उपचार की जिम्मेदारी यही महिलाएँ निभाती हैं।

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 मितानिन कौन हैं?

मितानिन छत्तीसगढ़ की वह स्वास्थ्य कार्यकर्ता हैं जो गाँव-गाँव में प्राथमिक चिकित्सा, गर्भवती महिलाओं की देखभाल, बच्चों के टीकाकरण, मलेरिया-डेंगू जैसी बीमारियों की रोकथाम, और सरकारी योजनाओं की जानकारी आम जनता तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
राज्य में लगभग 70 हजार से अधिक मितानिनें सक्रिय हैं, जिनकी मेहनत ने गाँवों में स्वास्थ्य-जागरूकता को जमीनी स्तर तक पहुँचाया है।


 हड़ताल की मुख्य वजहें

मितानिन संग की हड़ताल सिर्फ वेतन वृद्धि तक सीमित नहीं है। उनकी प्रमुख मांगें इस प्रकार हैं —

  1. न्यूनतम मानदेय सुनिश्चित किया जाए — मितानिनों को वर्तमान में केवल 2000 से 3000 रुपये मासिक प्रोत्साहन राशि दी जाती है, जबकि उन्हें नियमित स्वास्थ्यकर्मी के बराबर कार्य करना पड़ता है।

  2. स्थायी पद का दर्जा मिले — कई वर्षों से कार्यरत मितानिनों को अस्थायी कर्मचारी के रूप में रखा गया है, जबकि उनकी सेवा स्वास्थ्य तंत्र की मूलभूत आवश्यकता बन चुकी है।

  3. बीमा, पेंशन और चिकित्सा लाभ — वर्षों से सेवा दे रही मितानिनें खुद स्वास्थ्य-सुरक्षा से वंचित हैं। वे चाहती हैं कि उन्हें बीमा योजना और सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाया जाए।

  4. प्रशिक्षण और प्रोत्साहन राशि में वृद्धि — उन्हें दी जाने वाली प्रशिक्षण सुविधा और यात्रा-भत्ता नगण्य है, जिससे काम में बाधा आती है।


 रायगढ़ में आंदोलन की स्थिति

रायगढ़ जिले में सैकड़ों मितानिनें विभिन्न विकासखण्डों — जैसे तमनार, घरघोड़ा, खरसिया, बरमकेला और सारंगढ़ — से एकत्र होकर रायपुर की ओर कूच करने निकलीं।
लेकिन पुलिस प्रशासन ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए उन्हें जिले की सीमाओं में ही रोक दिया।

रायगढ़ के मितानिन संघ की अध्यक्ष ने बताया —

“हम स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे निचली कड़ी हैं, लेकिन हमारी आवाज ऊपर तक नहीं पहुँचती। जब तक हमारी मांगें नहीं मानी जातीं, हम कार्य पर नहीं लौटेंगी।”

मितानिनों ने जिला कलेक्टर कार्यालय के सामने धरना दिया और मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा।


 स्वास्थ्य सेवाओं पर असर

मितानिनों की हड़ताल से ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाएँ गहराई से प्रभावित हुई हैं।

रायगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों से मिल रही रिपोर्टों के अनुसार, जिन गाँवों में मितानिन सक्रिय थीं, वहाँ स्वास्थ्य शिविरों में लोगों की संख्या घट गई है।


 सरकार का पक्ष

स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने कहा कि राज्य सरकार मितानिनों की मांगों को गंभीरता से ले रही है।
विभाग का दावा है कि कुछ मांगें पहले ही मान ली गई हैं —
जैसे प्रोत्साहन राशि में 25% तक वृद्धि, और कार्य प्रदर्शन के आधार पर अतिरिक्त भुगतान

सरकारी प्रवक्ता ने कहा —

“मितानिनें हमारी स्वास्थ्य नीति का अहम हिस्सा हैं। उनकी सेवाओं को देखते हुए उचित समाधान निकाला जाएगा, लेकिन राज्य में स्वास्थ्य सेवाएँ पूरी तरह बंद न हों, यह भी जरूरी है।”

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 सामाजिक प्रतिक्रिया

जनता का एक बड़ा वर्ग मितानिनों के समर्थन में खड़ा है।
रायगढ़ के सामाजिक संगठनों और पंचायत प्रतिनिधियों ने कहा कि अगर ये महिलाएँ काम बंद कर देंगी, तो ग्रामीणों को उपचार में भारी दिक्कत होगी।

स्थानीय महिला समूहों ने भी सरकार से अपील की है कि जल्द से जल्द उनकी मांगें मान ली जाएँ, क्योंकि “मितानिन” सिर्फ एक स्वास्थ्यकर्मी नहीं, बल्कि गाँव की भरोसेमंद ‘दीदी’ हैं जो हर संकट में आगे रहती हैं।

 जनसमर्थन और चिंता दोनों साथ

मितानिनों की हड़ताल ने सिर्फ सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग को प्रभावित किया है। रायगढ़ और आसपास के क्षेत्रों में इस आंदोलन के प्रति लोगों की प्रतिक्रिया दो रूपों में दिखाई दे रही है — एक तरफ जनसमर्थन, दूसरी ओर चिंता और असुविधा


 ग्रामीण समाज का समर्थन

गाँवों में मितानिनों को लोग “दीदी” या “बहन” कहकर संबोधित करते हैं। वे हर घर की सदस्य जैसी होती हैं।
जब वे हड़ताल पर गईं, तो ग्रामीणों ने खुलकर उनका समर्थन किया।


 बुज़ुर्ग और रोगियों की चिंता

हड़ताल के चलते गाँवों में बुज़ुर्गों, गर्भवती महिलाओं और बच्चों की चिकित्सा सेवाएँ प्रभावित हो गई हैं।
कई लोगों ने चिंता जताई कि —

“मितानिन नहीं होने से अब गाँव में कोई प्राथमिक सहायता नहीं मिल रही। अगर बुखार या कोई बीमारी हो जाए तो अस्पताल तक पहुँचना मुश्किल होता है।”

हालाँकि ग्रामीणों ने असुविधा झेलते हुए भी यह कहा कि —

“ये महिलाएँ हमारे लिए हमेशा खड़ी रहीं, अब हम इनके साथ खड़े हैं।”


 सामाजिक संगठनों और कार्यकर्ताओं की प्रतिक्रिया

रायगढ़ जिले के सामाजिक कार्यकर्ता और NGO प्रतिनिधियों ने भी इस आंदोलन का समर्थन किया है।


 मीडिया और नागरिक समाज का नजरिया

स्थानीय मीडिया में मितानिनों की हड़ताल को प्रमुखता दी जा रही है।


 प्रशासनिक प्रतिक्रिया और संवाद की कोशिश

सामाजिक दबाव बढ़ने के बाद जिला प्रशासन ने मितानिन प्रतिनिधियों से संवाद शुरू करने की घोषणा की।
कलेक्टर कार्यालय में एक बैठक हुई, जिसमें प्रतिनिधियों ने अपनी मांगें दोहराईं।
हालाँकि कोई ठोस समाधान अभी तक सामने नहीं आया, पर प्रशासन ने यह संकेत दिया है कि जल्द ही सकारात्मक निर्णय लिया जा सकता है।


 सामाजिक संदेश — महिला सशक्तिकरण की नई मिसाल

यह आंदोलन सिर्फ अधिकारों की लड़ाई नहीं, बल्कि महिला सशक्तिकरण का प्रतीक बन गया है।
गाँव की मितानिनें जो पहले केवल “स्वास्थ्य कार्यकर्ता” मानी जाती थीं, अब समाज में नेतृत्व का उदाहरण पेश कर रही हैं।

मितानिन हड़ताल ने समाज में गहरा प्रभाव छोड़ा है।
लोगों को अब यह एहसास हो रहा है कि “स्वास्थ्य सेवा केवल अस्पतालों की चारदीवारी तक सीमित नहीं है, बल्कि उन महिलाओं के हाथों में है जो दिन-रात लोगों के जीवन को बेहतर बनाने में लगी रहती हैं।”
रायगढ़ की जनता का समर्थन और सहानुभूति इस आंदोलन को नई दिशा दे रही है — और संभवतः यही दबाव आने वाले दिनों में सरकार को निर्णायक कदम उठाने पर मजबूर करेगा।


 स्वास्थ्य नीति पर व्यापक सवाल

मितानिनों की हड़ताल सिर्फ एक आर्थिक आंदोलन नहीं है, यह राज्य की जनस्वास्थ्य नीति पर भी सवाल उठाती है —

इन सवालों के जवाब केवल सरकारी घोषणाओं से नहीं, बल्कि व्यवहारिक सुधारों से मिलेंगे।


रायगढ़ की भूमिका

रायगढ़ जिला हमेशा सामाजिक आंदोलनों में अग्रणी रहा है — चाहे वह पर्यावरणीय संघर्ष हों या सामाजिक न्याय के मुद्दे।
मितानिन आंदोलन में भी रायगढ़ की महिलाएँ अग्रिम पंक्ति में हैं।
उनकी जागरूकता और संगठन क्षमता यह दर्शाती है कि राज्य की महिलाओं में अपनी भूमिका को लेकर नई समझ विकसित हो रही है।

मितानिन संग की अनिश्चितकालीन हड़ताल सिर्फ कुछ माँगों की सूची नहीं है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की जमीनी सच्चाई का प्रतीक है।
रायगढ़ की मितानिनों ने यह साबित किया है कि वे केवल सेवा-दायित्व निभाने वाली कार्यकर्ता नहीं, बल्कि बदलाव की वाहक हैं।

सरकार और समाज – दोनों को यह समझना होगा कि इनकी समस्याओं का समाधान सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि सम्मान और सुरक्षा से जुड़ा है।
यदि इन्हें स्थायी दर्जा और उचित सुविधाएँ दी जाएँ, तो छत्तीसगढ़ का स्वास्थ्य-ढाँचा और अधिक मजबूत बन सकता है।

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