Site icon City Times Raigarh

मौत को मात देकर लौटा ‘1 नन्हा फाइटर’ रायगढ़ MCH के डॉक्टरों ने 850 ग्राम के प्रीमेच्योर बच्चे को 65 दिन के सघन इलाज से दी नई जिंदगी

मौत को मात देकर लौटा ‘1 नन्हा फाइटर’ रायगढ़ MCH के डॉक्टरों के जुनून ने 850 ग्राम के प्रीमेच्योर बच्चे को बचाया, 65 दिनों तक SNCU में चला सघन उपचार

जब उम्मीदें बहुत नाज़ुक होती हैं

चिकित्सा विज्ञान में कुछ क्षण ऐसे होते हैं, जब हर सांस 1 जंग बन जाती है और हर धड़कन उम्मीद की नई किरण जगाती है। रायगढ़ मेडिकल कॉलेज अस्पताल (MCH) में जन्मा 1 महज 850 ग्राम वजन का प्रीमेच्योर नवजात भी ऐसी ही एक जंग का प्रतीक बना। डॉक्टरों ने उसे प्यार से नाम दिया – ‘1 नन्हा फाइटर’
जिस बच्चे के जीवित रहने की संभावना बेहद कम मानी जा रही थी, उसी ने 65 दिनों तक चले सघन उपचार के बाद मौत को मात दे दी।


प्रीमेच्योर जन्म: 1 बड़ी चिकित्सकीय चुनौती

प्रीमेच्योर यानी समय से पहले जन्मे शिशुओं के सामने कई तरह की समस्याएं होती हैं।

850 ग्राम वजन के बच्चे को चिकित्सा भाषा में Extremely Low Birth Weight Baby कहा जाता है, जिनका इलाज बड़े शहरों के सुपर स्पेशलिटी अस्पतालों में भी चुनौतीपूर्ण होता है।


रायगढ़ MCH में हुआ चमत्कारी जन्म

रायगढ़ जिले के 1 ग्रामीण क्षेत्र से गर्भवती महिला को गंभीर स्थिति में मेडिकल कॉलेज अस्पताल लाया गया। गर्भावस्था के केवल कुछ महीनों में ही प्रसव पीड़ा शुरू हो चुकी थी।
डॉक्टरों ने स्थिति की गंभीरता को समझते हुए तुरंत आपात कदम उठाए।

जन्म के समय बच्चे का वजन मात्र 850 ग्राम था और उसकी सांसें बेहद कमजोर थीं।


जन्म के साथ ही शुरू हुआ जीवन-मरण का संघर्ष

जैसे ही बच्चे ने जन्म लिया, उसकी हालत नाजुक थी।

डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ ने बिना 1 पल गंवाए उसे वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा। यह वो क्षण था, जब हर मिनट कीमती था।Amar Ujala


SNCU: जहां 65 दिन तक चला संघर्ष

रायगढ़ MCH का SNCU यूनिट इस पूरे संघर्ष का केंद्र बना।
यहां बच्चे को करीब 65 दिनों तक रखा गया। इस दौरान—

1. वेंटिलेटर और CPAP सपोर्ट

शुरुआती दिनों में बच्चे के फेफड़े पूरी तरह विकसित नहीं थे।

2. संक्रमण से बचाव

प्रीमेच्योर बच्चों में संक्रमण का खतरा कई गुना अधिक होता है।

3. पोषण: हर बूंद थी अमृत

बच्चा दूध पीने की स्थिति में नहीं था।


डॉक्टरों की टीम: जुनून, धैर्य और समर्पण

इस ‘1नन्हे फाइटर’ को बचाने में नियोनेटलॉजिस्ट, पीडियाट्रिशियन, नर्सिंग स्टाफ और टेक्नीशियन की पूरी टीम दिन-रात जुटी रही।
डॉक्टरों के अनुसार—

“ऐसे मामलों में केवल दवाइयां नहीं, बल्कि धैर्य, निगरानी और टीमवर्क ही सबसे बड़ा इलाज होता है।”

हर दिन बच्चे की स्थिति की बारीकी से समीक्षा की जाती थी।


माता-पिता के लिए हर 1दिन था परीक्षा का

बच्चे के माता-पिता के लिए ये 65 दिन किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं थे।

मां का कहना था—

“मैंने उसे गोद में लेने का सपना नहीं छोड़ा था, बस भगवान और डॉक्टरों पर भरोसा रखा।”


धीरे-धीरे बढ़ती उम्मीद

लगभग 1 महीने बाद बच्चे की हालत में सुधार दिखने लगा।

यह पूरे SNCU स्टाफ के लिए राहत का पल था।


65वें दिन: जब मिली जीत

लगातार 65 दिनों की कड़ी मेहनत के बाद वह दिन आया, जब डॉक्टरों ने बच्चे को SNCU से डिस्चार्ज करने का फैसला लिया।
अब—

यह सिर्फ 1 डिस्चार्ज नहीं था, बल्कि मौत पर जीवन की जीत थी।


रायगढ़ MCH के लिए गर्व का क्षण

यह सफलता रायगढ़ मेडिकल कॉलेज अस्पताल के लिए मील का पत्थर साबित हुई।

अस्पताल प्रशासन ने पूरी टीम को बधाई दी।


क्यों खास है यह मामला?

इस केस की खास बातें—

  1. बेहद कम वजन (850 ग्राम)

  2. लंबी अवधि तक ICU उपचार

  3. सीमित संसाधनों में सफल इलाज

  4. टीमवर्क और मानवीय संवेदना का उदाहरण


समाज के लिए संदेश

यह कहानी सिर्फ 1 बच्चे की नहीं, बल्कि उम्मीद, भरोसे और चिकित्सा सेवा की ताकत की कहानी है।


1 नन्हा जीवन, बड़ी प्रेरणा

‘नन्हा फाइटर’ आज सिर्फ एक बच्चा नहीं, बल्कि हजारों माता-पिता के लिए उम्मीद की मिसाल बन गया है।
रायगढ़ MCH के डॉक्टरों की मेहनत ने यह साबित कर दिया कि जब इरादे मजबूत हों, तो मौत भी हार मान लेती है।

यह कहानी हमेशा याद दिलाएगी कि
जिंदगी की सबसे छोटी सांस भी, सबसे बड़ी जीत बन सकती है।

Next-

शीत लीला 2025 4 दिन से पारा 7°C पर, घने कोहरे से दृश्यता कम और स्वास्थ्य पर असर

Exit mobile version