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रायगढ़ में सरकारी जमीन की बंदरबांट के 7 बड़े खुलासे फाइल गुम, तहसील ऑफिस सवालों के घेरे में

रायगढ़ में सरकारी जमीन की बंदरबांट 7 बड़े खुलासे फाइल गुम, तहसील ऑफिस कटघरे में

रायगढ़ जिले में एक बार फिर सरकारी जमीन की बंदरबांट का मामला सामने आया है, जिसने न सिर्फ प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि आम जनता के मन में भी गंभीर आशंकाएं पैदा कर दी हैं। इस पूरे प्रकरण में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि सरकारी जमीन बेचने वाले आरोपी की पूरी फाइल तहसील कार्यालय से रहस्यमय तरीके से गायब हो गई, और इस पर जिम्मेदार अधिकारी – तहसीलदार – पूरी तरह मौन साधे हुए हैं।

यह मामला अब केवल जमीन हड़पने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह रिकॉर्ड गायब करने, मिलीभगत, और प्रशासनिक संरक्षण की ओर भी इशारा कर रहा है।


 क्या है पूरा मामला?

जानकारी के अनुसार रायगढ़ जिले के एक प्रमुख इलाके में स्थित कीमती सरकारी भूमि को निजी बताकर कुछ लोगों द्वारा बेच दिया गया।

जब इस पूरे मामले की शिकायत हुई और जांच शुरू हुई, तो तहसील कार्यालय से संबंधित मूल फाइल ही गायब पाई गई।

 प्रदेश में राजस्व विभाग के कार्यों और भूअर्जन घोटालों को लेकर कोई रैंकिंग बनेगी तो रायगढ़ जिला निस्संदेह टॉप तीन में शुमार होगा। जिले के हर तहसील में अलग-अलग तरह से भूमि घोटाले हो रहे हैं। राजस्व सुधार के लिए जरूरी है कि कोई विसंगति सामने आने पर सख्त से सख्त कार्रवाई हो। लेकिन ऐसा होता दिख नहीं रहा है।

कापू तहसील में सरकारी जमीन को बेचने और खरीदने वालों पर अब तक एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकी है। फाइल भी गुम हो गई है। जब राजस्व घोटालों और अनियमितताओं पर सख्त कार्रवाई बंद हो जाती है, तो गड़बडिय़ां बढ़ती जाती हैं। गड़बड़ी करने का मौका मिलते ही सरकारी जमीनें तक बेच दी जाती हैं। धरमजयगढ़ में शासकीय भूमि को तीन व्यक्तियों ने पटवारी के साथ मिलकर बेच दी।

शिकायत होने पर पता चला तो जांच हुई। कार्रवाई के लिए फाइल आगे बढ़ी तो इसे रोक दिया गया। धरमजयगढ़ में सरकारी जमीन को हथियाने के लिए जैसा तरीका अपनाया गया, वह आश्चर्यजनक है। ग्राम रायमेर की भूमि खनं 467/23 रकबा 0.248 हे., 467/25 रकबा 0.965 हे. और 467/36 रकबा 0.874 हे. शासकीय भूमि बड़े झाड़ के जंगल मद में दर्ज थी। वर्ष 1930 में मूल खसरा नंबर 467 रकबा में 89.46 हे. जंगल मद दर्ज था। बाद में इसके कई टुकड़े करके ग्रामवासियों को पट्टेदार के रूप में दर्ज किया गया। लेकिन उपरोक्त तीनों खसरों में किसी का नाम दर्ज नहीं था।

इस जमीन को पहले उजित राम पिता नान्ही राम के नाम पर दर्ज किया गया। उसकी ओर से आम मुख्त्यारनामा कैलाश कुमार जेठवानी पिता परशुराम जेठवानी निवासी धरमजयगढ़ के नाम किया गया। कैलाश ने यह जमीन मधुसूदन अग्रवाल पिता शंभूनारायण अग्रवाल निवासी पत्थलगांव को बेच दी। पटवारी राकेश साय ने विक्रय पत्र के साथ चतुर्सीमा, बी-वन खसरा और नक्शा दिया। इसकी शिकायत हुई तो प्रशासन में खलबली मच गई। आनन-फानन जांच करवाई गई। पता चला कि उजित राम किसी कैलाश जेठवानी को नहीं जानता। मतलब फर्जी तरीके से जमीन हथियाने के लिए ऐसा कुचक्र रचा गया।

हो चुके हैं एफआईआर के आदेश

जांच में पाया गया कि खनं 467/23 रकबा 0.248 हे., 467/25 रकबा 0.965 हे. और 467/36 रकबा 0.874 हे. भूमि शासकीय भूमि के रूप में दर्ज थी। यह किसी को भी आवंटित नहीं थी। इसीलिए रायमेर गांव के उजित राम का नाम पहले दर्ज कराया गया। इसके बाद जमीन की पावर ऑफ अटॉर्नी कैलाश जेठवानी के नाम दी गई।Amar Ujala

उसने पत्थलगांव के मधुसूदन अग्रवाल को जमीन बेची। जमीन पर गिरदावरी भी की गई है जिसमें धान की फसल का उल्लेख है। जांच करने के बाद पटवारी राकेश साय को सस्पेंड किया गया गया था। इसके अलावा राकेश साय, कैलाश जेठवानी और मधुसूदन अग्रवाल के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करने की अनुशंसा की गई है, लेकिन कापू तहसीलदार ने अब तक कोई कार्रवाई नहीं की है।


 फाइल गायब होने से उठे 7 बड़े सवाल

यह पूरा मामला कई गंभीर सवाल खड़े करता है, जिनके जवाब अब तक नहीं मिले हैं:

 सरकारी जमीन की बिक्री की अनुमति किसने दी?

क्या बिना सक्षम अधिकारी की अनुमति के रजिस्ट्री संभव है?
यदि नहीं, तो किसके आदेश पर यह जमीन बेची गई?


 तहसील कार्यालय से फाइल कैसे गायब हुई?

तहसील ऑफिस कोई आम जगह नहीं, बल्कि राज्य का आधिकारिक रिकॉर्ड केंद्र है।


 तहसीलदार की चुप्पी क्यों?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि
तहसीलदार इस मामले में बयान देने से क्यों बच रहे हैं?
क्या यह चुप्पी किसी बड़े खेल की ओर इशारा करती है?


 रिकॉर्ड शाखा और पटवारी की भूमिका

सरकारी जमीन से जुड़े हर रिकॉर्ड में


 रजिस्ट्री ऑफिस ने जांच क्यों नहीं की?

जब जमीन सरकारी थी, तो
रजिस्ट्री के समय आपत्ति क्यों नहीं लगी?
क्या जानबूझकर आंखें मूंद ली गईं?


 अब जांच कैसे होगी?

फाइल के बिना


 क्या पहले भी हुए हैं ऐसे मामले?

स्थानीय लोगों का कहना है कि
 रायगढ़ में यह पहला मामला नहीं है।
पहले भी कई सरकारी जमीनें इसी तरह निजी हाथों में चली गईं, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई।

 कानून क्या कहता है?

भारतीय कानून के अनुसार:

यदि फाइल जानबूझकर गायब की गई है, तो यह साक्ष्य नष्ट करने का अपराध भी बनता है।


 स्थानीय लोगों में आक्रोश

इस पूरे मामले को लेकर स्थानीय नागरिकों में भारी रोष है।
लोगों का कहना है:

“अगर गरीब आदमी का एक कागज कम हो जाए, तो उसे सालों तहसील के चक्कर काटने पड़ते हैं, लेकिन यहां पूरी फाइल गायब हो गई और कोई जवाब नहीं!”


 विपक्ष और सामाजिक संगठनों की मांग


 क्या यह सिर्फ जमीन का मामला है?

विशेषज्ञों का मानना है कि
 यह मामला सिर्फ जमीन का नहीं, बल्कि

यदि अभी कार्रवाई नहीं हुई, तो भविष्य में
सरकारी संपत्ति की खुली लूट को कोई नहीं रोक पाएगा।


 आगे क्या होना चाहिए?

  1. फाइल गुम होने पर तत्काल एफआईआर

  2. तहसील ऑफिस का रिकॉर्ड ऑडिट

  3. डिजिटल रिकॉर्ड से दस्तावेज पुनः तैयार

  4. जमीन की रजिस्ट्री निरस्त

  5. दोषियों पर कठोर कानूनी कार्रवाई

रायगढ़ में सरकारी जमीन की बंदरबांट का यह मामला प्रशासन की साख पर सीधा सवाल है।
जब तक

तब तक यह माना जाएगा कि
सरकारी जमीन लूटने वालों को सिस्टम का संरक्षण प्राप्त है।

अब देखना यह है कि
क्या प्रशासन सच में कार्रवाई करता है
या यह मामला भी फाइलों की तरह गुम हो जाएगा।

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