छाल में 75 रुपए प्रति टन लेकर ग्रेड की हेराफेरी, धान खरीदी केंद्रों में भ्रष्टाचार उजागर

छाल में 75 रुपए प्रति टन लेकर ग्रेड की हेराफेरी!

धान खरीदी केंद्रों में भ्रष्टाचार का नया चेहरा, किसानों के साथ खुला अन्याय

छत्तीसगढ़ को देश का धान का कटोरा कहा जाता है। यहां की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा खेती और खासकर धान उत्पादन पर निर्भर है। सरकार हर साल समर्थन मूल्य पर धान खरीदी कर किसानों को राहत देने का दावा करती है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे कहीं अलग नजर आती है। रायगढ़ जिले के छाल क्षेत्र से सामने आई एक चौंकाने वाली शिकायत ने पूरे खरीदी तंत्र पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि धान खरीदी केंद्रों में 75 रुपए प्रति टन की अवैध वसूली कर जानबूझकर ग्रेड की हेराफेरी की जा रही है।

यह मामला सिर्फ पैसे की वसूली तक सीमित नहीं है, बल्कि यह किसानों के आत्मसम्मान, उनकी मेहनत और सरकारी व्यवस्था की साख से भी जुड़ा हुआ है। Amar Ujala


क्या है पूरा मामला?

छाल क्षेत्र के कई किसानों ने आरोप लगाया है कि धान खरीदी केंद्रों में उनके साफ-सुथरे और मानक गुणवत्ता वाले धान को जानबूझकर निम्न ग्रेड में डाल दिया जाता है। इसके बाद उनसे कहा जाता है कि यदि वे धान को उच्च ग्रेड में दर्ज कराना चाहते हैं, तो उन्हें 75 रुपए प्रति टन अतिरिक्त देने होंगे।

यह प्रक्रिया पूरी तरह से अनौपचारिक, गैरकानूनी और सुनियोजित तरीके से की जा रही है। किसान यदि पैसा देने से मना करते हैं, तो उनके धान में नमी, टूटन या खराब गुणवत्ता का बहाना बनाकर उसे कम दाम में स्वीकार किया जाता है।


ग्रेडिंग प्रक्रिया क्या होती है?

धान खरीदी के दौरान सामान्यतः निम्न बिंदुओं के आधार पर ग्रेड तय किया जाता है—

  • नमी की मात्रा

  • टूटे दानों का प्रतिशत

  • कचरा या भूसा

  • दाने का आकार और चमक

सरकारी नियमों के अनुसार, यदि धान निर्धारित मानकों पर खरा उतरता है तो उसे ए-ग्रेड या सामान्य ग्रेड में लिया जाना चाहिए। लेकिन छाल क्षेत्र में आरोप है कि इस प्रक्रिया का दुरुपयोग कर जानबूझकर गलत रिपोर्टिंग की जा रही है।


किसानों का दर्द: “मेहनत हमारी, फायदा दलालों का”

ग्रेड हेराफेरी से सबसे ज्यादा नुकसान किसानों को हो रहा है। किसान पहले ही—

  • महंगे बीज

  • खाद और कीटनाशक

  • डीज़ल और सिंचाई

  • मजदूरी

जैसी लागतों से जूझ रहे हैं। ऐसे में जब सरकारी खरीदी केंद्रों पर भी उनसे अवैध वसूली हो, तो उनकी आर्थिक स्थिति और कमजोर हो जाती है।

कई किसानों का कहना है कि वे मजबूरी में पैसा दे देते हैं, क्योंकि धान वापस ले जाने या दोबारा सुखाने का खर्च और समय दोनों ही उनके लिए संभव नहीं होता।


75 रुपए प्रति टन: छोटी रकम, बड़ा घोटाला

पहली नजर में 75 रुपए प्रति टन बहुत बड़ी राशि नहीं लगती, लेकिन यदि इसे—

  • सैकड़ों किसानों

  • हजारों टन धान

से जोड़ा जाए, तो यह लाखों रुपए के अवैध लेन-देन का मामला बन जाता है। यही वजह है कि यह केवल भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि संगठित आर्थिक अपराध की श्रेणी में आता है।


खरीदी केंद्रों पर किसकी भूमिका संदिग्ध?

इस पूरे मामले में कई स्तरों पर सवाल उठ रहे हैं—

  1. ग्रेडिंग कर्मचारी – जो गुणवत्ता जांच करते हैं

  2. समिति प्रबंधक – जिनकी जिम्मेदारी निगरानी की होती है

  3. बिचौलिये या दलाल – जो किसानों और कर्मचारियों के बीच कड़ी बनते हैं

यदि यह वसूली बिना किसी उच्चस्तरीय संरक्षण के हो रही है, तो सवाल यह भी है कि अब तक इस पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?


प्रशासन और शासन की चुप्पी

छाल क्षेत्र से शिकायतें सामने आने के बावजूद अभी तक कोई ठोस सार्वजनिक कार्रवाई देखने को नहीं मिली है। न ही किसी अधिकारी ने स्पष्ट बयान दिया है। यह चुप्पी—

  • किसानों के आक्रोश को बढ़ा रही है

  • शासन की मंशा पर सवाल खड़े कर रही है

  • भ्रष्ट तत्वों का मनोबल बढ़ा रही है


किसानों में बढ़ता असंतोष

ग्रेड हेराफेरी और अवैध वसूली की खबरें फैलने के बाद किसानों में गुस्सा है। कई किसान संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि—

  • दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई

  • निष्पक्ष जांच नहीं हुई

तो वे आंदोलन और विरोध प्रदर्शन का रास्ता अपना सकते हैं।


क्या कहता है कानून?

सरकारी धान खरीदी में—

  • अवैध वसूली

  • गलत ग्रेडिंग

  • किसानों को आर्थिक नुकसान

करना भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है। इसके अंतर्गत—

  • सेवा नियमों का उल्लंघन

  • आर्थिक अपराध

  • किसान हित संरक्षण कानून

के तहत कार्रवाई संभव है। बावजूद इसके, अब तक किसी बड़े निलंबन या एफआईआर की खबर सामने नहीं आई है।


पारदर्शिता के दावे बनाम जमीनी हकीकत

सरकार बार-बार—

  • ऑनलाइन एंट्री

  • सीसीटीवी निगरानी

  • पारदर्शी खरीदी

के दावे करती है, लेकिन छाल का यह मामला दिखाता है कि तकनीक के बावजूद भ्रष्टाचार जिंदा है। सवाल यह है कि—

  • क्या निगरानी तंत्र कमजोर है?

  • या फिर जानबूझकर आंखें मूंदी जा रही हैं?


समाधान क्या हो सकता है?

इस तरह की हेराफेरी रोकने के लिए जरूरी है—

  1. स्वतंत्र जांच टीम का गठन

  2. खरीदी केंद्रों पर थर्ड पार्टी निरीक्षण

  3. किसानों को शिकायत दर्ज कराने की सरल व्यवस्था

  4. दोषियों पर तत्काल निलंबन और कानूनी कार्रवाई

  5. ग्रेडिंग प्रक्रिया का वीडियो रिकॉर्ड

छाल में 75 रुपए प्रति टन लेकर ग्रेड की हेराफेरी का मामला सिर्फ एक क्षेत्र की समस्या नहीं है, बल्कि यह पूरे धान खरीदी तंत्र की विश्वसनीयता पर सवाल है। यदि समय रहते इस पर सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो किसानों का भरोसा पूरी तरह टूट सकता है।

किसान देश की रीढ़ है और उसकी मेहनत के साथ किसी भी प्रकार का समझौता न केवल अनैतिक है, बल्कि अपराध भी है। अब देखना यह है कि प्रशासन और शासन इस गंभीर आरोप को कितनी गंभीरता से लेता है।

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