1 जमीन की बेनामी खरीद छत्तीसगढ़ में सत्ता, साख और किसानों के हितों का खेल

छत्तीसगढ़ में कृषि और जमीन का महत्व केवल किसानों तक सीमित नहीं है। यह राज्य की अर्थव्यवस्था और सामाजिक ढांचे के लिए भी बेहद अहम है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में जमीन की बेनामी खरीद की घटनाओं ने किसानों, प्रशासन और सरकारी योजनाओं के लिए चिंता बढ़ा दी है।
बेनामी खरीद का खेल सिर्फ जमीन खरीदने तक सीमित नहीं है—इसमें धन का लेन-देन, राजनीतिक संरक्षण, प्रशासनिक कोताही और नेटवर्क की मिलीभगत शामिल होती है।
रायगढ़ में आदिवासी जमीनों की बेनामी खरीदी ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। सेठ-साहूकारों ने अपने आदिवासी नौकरों के नाम पर करोड़ों की जमीनें खरीदी हैं। इसी सूची में एक ऐसी जमीन भी शामिल हो गई है, जो नि:संतान व्यक्ति की थी। इसे हड़पने के लिए खरसिया के महेश और रायपुर के विनय ने जबर्दस्त तरीका अपनाया। पहले एक व्यक्ति को वारिस बताकर उसके नाम जमीन चढ़ाई। फिर दूसरे के नाम पर रजिस्ट्री करवा दी।
लैलूंगा में आदिवासियों की जमीन हड़पने का गिरोह काम कर रहा है। इसमें सफेदपोश लोगों के साथ बड़े जमीन दलाल शामिल हैं। नगर पंचायत लैलूंगा की सीमा में दो खसरा नंबरों की करीब तीन एकड़ भूमि को फर्जी तरीके से दूसरे के नाम पर दर्ज करवा लिया गया। शिकायतकर्ताओं ने तहसीलदार लैलूंगा सहित कुछ राजस्व कर्मचारियों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। मामले की शिकायत जिला मुख्यालय तक पहुंची है। नगर पंचायत लैलूंगा के खसरा नंबर 622/12/ग रकबा 0.2100 हे. और 502/6/ख रकबा 1 हे. से जुड़ा है।
यह भूमि पूर्व में स्व. जहर साय आत्मज बैगा राम के नाम पर दर्ज थी। मृतक जहर साय नि:संतान थे। उनकी मौत के बाद करीबी रिश्तेदारों के नाम पर जमीन की जानी थी। उनके करीब 14 निकट संबंधी मौजूद हैं, लेकिन छत्तर साय आत्मज चंदर साय निवासी पाकरगांव ने तहसील न्यायालय में आवेदन लगाकर भूमि पर अपना नाम दर्ज करवा लिया। तहसीलदार ने उत्तराधिकार जांच किए बिना आदेश भी पारित कर दिया। ग्राम पंचायत से सत्यापन भी नहीं कराया।
9 अप्रैल 2025 तथा 15 सितंबर 2025 को एक ही प्रकरण में दो-दो आदेश जारी किए। नामांतरण होते ही उक्त भूमि को खरसिया निवासी महेश ने अपने ही ड्राइवर गोविंद राम सिदार के नाम से 3.60 लाख में रजिस्ट्री करा लिया। इस काम में रायपुर के विनय ने मदद की। भूमि की वास्तविक कीमत करीब 1.68 करोड़ है। स्टाम्प ड्यूटी में भी भारी हेराफेरी की गई। केवल 24,000 का स्टाम्प शुल्क लगाया गया है।
25 अगस्त को हुई रजिस्ट्री
छतर साय ने गाविंद राम के नाम पर 25 अगस्त 2025 को रजिस्ट्री करवाई है, जिसका नामांतरण किया गया है। शिकायकर्ताओं का कहना है कि तहसीलदार ने छतर साय का नाम दर्ज करने के पूर्व विधिक वारिसों को सूचना भी नहीं दी। कोई सार्वजनिक ईश्तहार जारी नहीं हुआ और न ही ग्राम पंचायत से पुष्टि की गई। दस्तावेजों का सत्यापन नहीं हुआ। साजिश के तहत भूमि बिकवाई गई।
बेनामी जमीन खरीद क्या है?
बेनामी जमीन खरीद का मतलब है—ऐसी जमीन का लेन-देन जिसमें असली मालिक सामने नहीं आता। जमीन किसी अन्य व्यक्ति के नाम पर खरीदी जाती है। यह कई कारणों से किया जाता है:
-
कर और दस्तावेज में बचत – सरकारी रिकॉर्ड में कम कीमत या नाम बदलकर टैक्स बचाया जा सकता है।
-
कानूनी सुरक्षा – विवाद या अदालत से बचने के लिए जमीन का नाम असली मालिक के बजाय किसी भरोसेमंद व्यक्ति पर किया जाता है।
-
वित्तीय लाभ – जमीन को अवैध या कम दाम में खरीदकर आगे महंगे दाम पर बेचा जाता है।
बेनामी खरीदी का मामला
जिस व्यक्ति गोविंद राम सिदार आत्मज साहू सिंह सिदार, निवासी केनाभांठा, खरसिया के नाम रजिस्ट्री करवाई गई है, वह आर्थिक रूप से इतना सक्षम नहीं है कि नगर पंचायत क्षेत्र में तीन एकड़ भूमि खरीद सके। उसका नाम उपयोग कर किसी बड़े व्यापारी ने अपने लिए जमीन खरीदी है। वारिस का नाम चढ़ाने की प्रक्रिया में तहसीलदार ने जानबूझकर गड़बड़ी की। सूत्रों के मुताबिक कलेक्टर ने इस मामले की जांच करने का आदेश दिया है

छत्तीसगढ़ में नेटवर्क कैसे काम करता है?
1) फील्ड एजेंट और स्थानीय दलाल
स्थानीय स्तर पर छोटे एजेंट और दलाल सक्रिय रहते हैं। ये लोग जमीन की पहचान, मालिकों से संपर्क और दस्तावेज़ी प्रक्रिया का काम करते हैं।
2) शहर में बैठे मास्टर माइंड
राजधानी रायपुर और अन्य बड़े शहरों में बड़े खिलाड़ी बैठे हैं जो धन का प्रवाह नियंत्रित करते हैं। वे जमीन के मालिकों और दलालों के बीच सौदे तय करते हैं।
3) बैंकिंग और भुगतान
अधिकतर लेन-देन काला धन या जाली बैंक ट्रांजेक्शन के माध्यम से होता है। नामों और खाता नंबरों को घुमाकर वास्तविक मालिक का पता नहीं चलता।
कदम-दर-कदम बेनामी जमीन की खरीद
-
मूल मालिक का पता और दबाव
जमीन का असली मालिक अक्सर गरीब या कम जानकारी वाला किसान या छोटे व्यवसायी होता है। दलाल उनसे कानूनी या गैरकानूनी दबाव के जरिए जमीन ले लेते हैं। -
फर्जी दस्तावेज़ बनाना
जमीन के नक्शे, पंजीयन और बिक्री दस्तावेज़ में हेरफेर किया जाता है। कभी-कभी मृतक या अनुपस्थित व्यक्ति के नाम का इस्तेमाल होता है। -
नाम बदलकर पंजीयन
जमीन को किसी भरोसेमंद व्यक्ति या कंपनी के नाम पर कर दिया जाता है। यह मालिक को सीधे नहीं दिखता। -
बिक्री और मुनाफा
नाम बदली जमीन को उच्च दाम पर बेचा जाता है। इससे बड़े पैमाने पर धन का लाभ उठाया जाता है।
किसानों और सामान्य जनता पर असर
-
किसानों की भूमि सुरक्षित नहीं: फर्जी दस्तावेज और दबाव से असली मालिकों की जमीन छिन सकती है।
-
सरकारी योजनाओं पर असर: कृषि ऋण, MSP या जमीन अधिग्रहण की योजनाओं में भ्रम पैदा होता है।
-
सामाजिक असंतुलन: गरीब और असहाय लोग प्रभावित होते हैं, जबकि धनाढ्य लोग फायदा उठाते हैं। Khabar Lahariya
प्रशासन और कानून की चुनौती
-
साक्ष्य जुटाना कठिन: फर्जी दस्तावेज़ और नाम बदलने की तकनीकें जटिल हैं।
-
स्थानिक दबाव: गवाह डर से सामने नहीं आते।
-
लंबी कानूनी प्रक्रिया: अदालतों में केस लंबित रहते हैं और मास्टर माइंड बच जाते हैं।
हालांकि छत्तीसगढ़ सरकार और प्रशासन ने डिजिटल रिकॉर्डिंग, जियो-टैगिंग और ऑनलाइन पंजीकरण जैसे उपाय शुरू किए हैं।

संभावित समाधान
-
डिजिटल रियल एस्टेट पंजीकरण – जमीन की पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन ट्रैक हो।
-
कड़ी कानूनी कार्रवाई – बेनामी जमीन खरीदी पर तुरंत जुर्माना और जेल।
-
किसान जागरूकता अभियान – अपने जमीन के दस्तावेज़, पंजीकरण और ऋण की जानकारी रखें।
-
स्वतंत्र ऑडिट और निरीक्षण – हर वर्ष या सीजन में भूमि का ऑडिट और सत्यापन।
-
समझदारी से बैंकिंग और लेन-देन – नकली खाते और लेन-देन पर नजर।
छत्तीसगढ़ में जमीन की बेनामी खरीद न केवल किसानों की सुरक्षा और आर्थिक हितों के लिए खतरा है, बल्कि यह सरकारी योजनाओं और न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाती है।
तकनीक, प्रशासनिक सख्ती और सामाजिक जागरूकता से ही इस जाल को तोड़ा जा सकता है। वास्तविक मालिक को उसके हक का लाभ मिले, और अवैध मुनाफाखोरों को रोका जा सके—यही इस प्रणाली सुधार का मूल उद्देश्य होना चाहिए।
Next-

1 thought on “छत्तीसगढ़ में बेनामी 1 जमीन खरीदी मास्टर माइंड, किसान और सरकारी चुनौती”