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छत्तीसगढ़ का 90 वर्षीय किसान खेतों का ‘किंग’ कैसे बना यह बुजुर्ग? उम्र को मात देने वाली प्रेरणादायक कहानी

छत्तीसगढ़ का 90 वर्षीय किसान उम्र को मात देकर आज भी खेतों में जुटा, ग्रामीण बोले – यही है खेतों का ‘किंग’


 उम्र नहीं, इरादे बताते हैं किसान की असली ताकत

छत्तीसगढ़ की धरती हमेशा से मेहनतकश किसानों की भूमि रही है। यहां के खेत, यहां की मिट्टी और यहां का श्रम—तीनों मिलकर एक ऐसी पहचान बनाते हैं, जिसे दुनिया सम्मान से देखती है। लेकिन इन्हीं किसानों के बीच एक ऐसी शख्सियत मौजूद है जिसने उम्र की सभी सीमाओं को तोड़ दिया है। लगभग 90 वर्ष की आयु में भी यह बुजुर्ग किसान रोज सुबह सूर्योदय से पहले उठकर खेतों में उतर जाता है। न तो बढ़ती उम्र का असर, न स्वास्थ्य की चुनौतियाँ—किसान आज भी वही जोश, वही ऊर्जा, वही समर्पण लिए अपने खेतों का रखवाला बना खड़ा है।

ग्रामीण उन्हें प्यार से ‘खेतों का किंग’ कहते हैं, क्योंकि जिस लगन और प्रेम से वे अपने खेतों को संवारते हैं, वह नई पीढ़ी के लिए भी प्रेरणा का स्रोत है। यह ब्लॉग केवल एक किसान की कहानी नहीं है, बल्कि उस पूरी परंपरा, संस्कृति और जज़्बे का सम्मान है जो भारतीय कृषि को जीवित रखती है।


किसान की पहचान — साधारण जीवन, असाधारण सोच

छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के पोंड़ी-उपरोड़ा ब्लॉक के दूरस्थ ग्राम घोसरा में रहने वाले 90 वर्षीय किसान राम सिंह आज भी पहले की तरह खेत में सक्रिय हैं। उम्र के इस पड़ाव पर जहां अधिकतर लोग काम से दूरी बना लेते हैं, वहीं राम सिंह हर दिन खेत में उतरकर युवा पीढ़ी को मेहनत और समर्पण का संदेश दे रहे हैं। राम सिंह ने खेती के कठिन दिनों को करीब से जिया है।

वे बताते हैं कि पहले न तो खेतों में आधुनिक साधन थे और न ही उपार्जन केंद्रों में सुविधाओं की कोई व्यवस्था। जब फसल अच्छी हो जाती थी, तब उसे बेचने में और भी अधिक परेशानी उठानी पड़ती थी। उपार्जन केंद्रों में लंबी लाइनें लगती थीं, टोकन की व्यवस्था नहीं थी और किसानों को कई-कई दिन वहीं रुककर अपने धान की रखवाली करनी पड़ती थी।

ढाई एकड़ में खेती करने वाले राम सिंह का कहना है कि पहले खाद और अन्य आवश्यक वस्तुओं के लिए किसानों को अक्सर साहूकारों के चक्कर काटने पड़ते थे। महंगे ब्याज पर मिलने वाला कर्ज किसानों की मुश्किलों को और बढ़ा देता था। मौसम भी अक्सर साथ नहीं देता था।

कभी बारिश कम होती थी, तो कभी अधिक। खराब मौसम और फसल चौपट होने का दर्द केवल वही किसान समझ सकते हैं जिन्होंने इसे सहा हो। समय के साथ हालात बदलते गए। राम सिंह मानते हैं कि अब खेती पहले की तुलना में कहीं अधिक सहज हो गई है।


दिनचर्या – आधुनिक युवा भी सीख लें ऐसा अनुशासन

90 साल की उम्र में भी इस किसान की दिनचर्या सुनकर कोई भी हैरान रह जाए:

उनकी ऊर्जा का रहस्य वही है जो हमारे पूर्वजों का हुआ करता था—प्राकृतिक जीवनशैली, शुद्ध भोजन और मन में सकारात्मकता। उनका मानना है कि
“कुदरत के साथ रहने वाला कभी बीमार नहीं पड़ता। खेती कुदरत से जोड़ती है।”


शारीरिक मेहनत – आधुनिक मशीनों के बावजूद हाथों की ताकत बनी पहचान

आज के समय में जब मशीनें खेतों में बड़े पैमाने पर काम कर रही हैं, इस बुजुर्ग किसान ने तकनीक को अपनाया जरूर है, पर अपनी मेहनत को कम नहीं किया। वे हल्की जुताई, बीज रोपण, कटाई की देखरेख जैसे कार्य स्वयं करते हैं। गांव वाले कहते हैं कि वे आज भी युवाओं की तरह:

उनकी मेहनत देखकर गांव के युवा भी प्रेरित होते हैं और कहते हैं—
“जब दादा जी 90 की उम्र में खेतों में पसीना बहा सकते हैं, तो हमें तो दोगुनी मेहनत करनी चाहिए।”


खेती के प्रति समर्पण – ‘खेत ही उनकी पूजा है’

किसान के लिए उनका खेत मंदिर है। वे कहते हैं—
“अगर धरती मां को समय दोगे, तो धरती तुम्हें दोगुना लौटाएगी।”

उनका खेत हमेशा हरा-भरा रहता है। चाहे मौसम जैसा भी हो, उन्होंने कभी अपनी फसल को निराश नहीं होने दिया। वे हर सीजन में खेती के नए तरीकों को अपनाते हैं। जैविक खाद, गोबर खाद और देशी तकनीकों को वे प्राथमिकता देते हैं।


नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा – अनुभव से सीखने वाला अनमोल गुरु

गांव में कई युवा उनसे खेती सीखने आते हैं। वे युवाओं को हर कदम पर मार्गदर्शन देते हैं:

90 वर्षीय किसान का अनुभव युवा किसानों के लिए खजाने की तरह है। वे यह भी बताते हैं कि खेती में केवल मेहनत नहीं, समझदारी भी जरूरी है। वे युवाओं को बार-बार समझाते हैं—
“खेती खर्च नहीं, निवेश है। मिट्टी में प्यार डालोगे, तो फसल में आशीर्वाद मिलेगा।”


परिवार का सहयोग – बुजुर्ग किसान की ताकत

भले ही किसान उम्रदराज हैं, लेकिन परिवार उनका पूरा सहयोग करता है। बच्चे और पोते खेत से संबंधित भारी काम संभाल लेते हैं, जबकि वे हल्के और देखरेख वाले काम करते हैं। परिवार कहता है कि
“बाबा जी खेतों में जाएंगे तभी खुश रहते हैं। उन्हें घर में बैठाकर हम उनके जीवन से खुशी नहीं छीन सकते।”

उनकी यह भावना बताती है कि किसान और खेती का रिश्ता कितना गहरा होता है।


गांव और ग्रामीणों का सम्मान – ‘खेतों का किंग’ बनने का सफर

गांव के लोग उन्हें सम्मान की नज़र से देखते हैं। उनके लिए यह किसान केवल एक बुजुर्ग नहीं, बल्कि प्रेरणा का स्तंभ है। गांव की महिलाएँ कहती हैं—
“जब खेतों में जाते हैं, तो लगता है खेतों को आशीर्वाद मिल रहा है।”

युवाओं के लिए वे जीवित पुस्तक की तरह हैं। बुजुर्ग उनके लिए गुरू समान हैं।
कई बार पंचायत में खेती से जुड़े फैसलों में उनकी सलाह ली जाती है।

उन्हें ‘‘खेतों का किंग’’ नाम इसलिए दिया गया है क्योंकि:


स्वास्थ्य और खेती – कैसे बनाए रखा खुद को फिट

90 वर्ष की उम्र तक खेती करना कोई आसान बात नहीं। लेकिन इस किसान ने अपनी दिनचर्या में कुछ ऐसी आदतें शामिल कीं जो उन्हें आज भी मजबूत बनाए हुए हैं:

1. सादा भोजन

2. शारीरिक श्रम

दिन में थोड़ी-बहुत मेहनत करने से शरीर सक्रिय रहता है।

3. तनाव से दूरी

वे कहते हैं—“चिंता नहीं, खेती करना सीखो।”

4. नींद का अनुशासन

जल्दी सोना और जल्दी उठना उनकी दिनचर्या का मुख्य हिस्सा है।

5. प्रकृति के साथ तालमेल

खुले वातावरण में काम करने से उनके भीतर ताजगी बनी रहती है। Navbharat Times+1


खेती में बदलाव – नई तकनीक भी अपनाई

बुजुर्ग किसान पुरानी परंपरा के साथ-साथ नई तकनीक से भी पीछे नहीं हैं। उन्होंने ड्रिप सिंचाई, स्प्रे मशीन, मिनी टिलर, नई किस्मों के बीज और फसल विज्ञान की आधुनिक सलाह को अपनाया। वे मानते हैं कि
“पुरानी समझ और नई तकनीक मिल जाए, तो खेती का भविष्य सुरक्षित हो जाता है।”

वे हमेशा सीखने की इच्छा रखते हैं। कभी-कभी कृषि विभाग के कार्यक्रमों में भी शामिल होते हैं और वहां से मिली जानकारी को अपने खेत में लागू करते हैं।


सरकारी योजनाओं का लाभ – किसान की जागरूकता

उनके परिवार ने बताया कि बुजुर्ग किसान कई कृषि योजनाओं का लाभ भी लेते हैं:

वे मानते हैं कि सरकार की योजनाएँ खेती को आसान बनाती हैं, इसलिए किसान को हमेशा अपडेट रहना चाहिए।


कहानी का संदेश – नई पीढ़ी खेती से दूर क्यों?

बुजुर्ग किसान कहते हैं कि
“नई पीढ़ी खेती को बोझ समझती है, कारोबार नहीं। लेकिन खेती छोड़ दी गई तो आने वाले वर्षों में समाज को कठिनाइयाँ झेलनी पड़ेंगी।”

उनका मानना है कि खेती में:

उनकी बातों में सच्चाई है, क्योंकि दुनिया में आज भी सबसे सुरक्षित और स्थायी पेशा कृषि ही है।


खेती और संस्कृति – दोनों का संगम

छत्तीसगढ़ की संस्कृति खेती से ही जन्म लेती है:

इन सभी में कृषि की छाप स्पष्ट दिखाई देती है। 90 वर्षीय किसान इस संस्कृति को आज भी जीवित रखे हुए हैं।
हर त्यौहार पर वे पारंपरिक विधि से खेत की पूजा करते हैं और आभार व्यक्त करते हैं।


 यह किसान केवल व्यक्ति नहीं, प्रेरणा का प्रतीक है

इस बुजुर्ग किसान की कहानी हमें यह सिखाती है कि जीवन में उम्र की सीमाएँ केवल भ्रम हैं। असली ताकत व्यक्ति के मन में होती है। यदि मन मजबूत है तो 90 की उम्र भी 40 जैसी लगती है।

उनका जीवन हमें बताता है—

इसलिए ग्रामीणों ने उन्हें ‘खेतों का किंग’ कहलाने का सम्मान दिया है। और सच कहें तो यह उपाधि उन्हें गर्व से पहननी चाहिए, क्योंकि वे खेतों के सच्चे राजा हैं—मेहनत के राजा, समर्पण के राजा और प्रेरणा के राजा।

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