अनावरी रिपोर्ट के आधार पर कटेंगे टोकन कहीं 16 क्विंटल तो कहीं 20, किसानों में बढ़ी चिंता

अनावरी रिपोर्ट के आधार पर कटेंगे टोकन कहीं 16 क्विंटल तो कहीं 20 क्विंटल किसानों के लिए क्यों बना चिंता का विषय?

खरीफ सीजन के बाद धान खरीदी का समय आते ही किसानों की उम्मीदें बढ़ जाती हैं। महीनों की मेहनत, लागत और मौसम की मार झेलने के बाद किसान सरकार की समर्थन मूल्य पर खरीदी को अपनी सबसे बड़ी राहत मानते हैं। लेकिन हर साल की तरह इस बार भी अनावरी रिपोर्ट किसानों के लिए एक अहम और विवादास्पद मुद्दा बनकर सामने आई है। इसी रिपोर्ट के आधार पर अब टोकन कटेंगे, और अलग–अलग इलाकों में किसानों को कहीं 16 क्विंटल तो कहीं 20 क्विंटल प्रति एकड़ धान बेचने की सीमा तय की जा रही है।

यह स्थिति न केवल किसानों के बीच असंतोष पैदा कर रही है, बल्कि प्रशासनिक प्रक्रिया और ज़मीनी हकीकत के बीच के फर्क को भी उजागर कर रही है।

धान खरीदी को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन ने अनावरी रिपोर्ट का फिल्टर लगा दिया गया है। पिछले साल की और वर्तमान के औसत उत्पादन के हिसाब से ही किसानों का रकबा सत्यापन करने का आदेश दिया जा रहा है। इस वजह से एक ही ब्लॉक में आसपास की समितियों के उत्पादन में अंतर आ रहा है। किसी समिति में 17 क्विंटल तो किसी में 20 क्विंटल प्रति एकड़ टोकन कट रहा है।

इस बार की धान खरीदी में कोचियों और बिचौलियों को नियंत्रित करते-करते अब वास्तविक किसानों पर प्रशासन का डंडा चल रहा है। धान खरीदी में अनावरी रिपोर्ट के आधार पर रकबा सत्यापन हो रहा है। इसी के हिसाब से टोकन काटा जा रहा है। भले ही प्रति एकड़ 21 क्विंटल धान खरीदी की जानी है लेकिन अनावरी के हिसाब से ही एंट्री की जा रही है, जहां भी अनावरी से अधिक रकबा सत्यापन हो गया तो पटवारियों को नोटिस दिया जा रहा है।

पटवारियों को कहा जा रहा है कि किसी भी तरह अनावरी से कम ही सत्यापन करें। बचे हुए रकबे का स्पॉट पर ही समर्पण करवाया जा रहा है। उदाहरण के लिए धरमजयगढ़ के कापू में 24-25 में अनावरी 14.95 क्विं. प्रति एकड़ था जो इस बार 19.15 क्विं. हो गया है। यहां पटवारी ने 112 किसानों का रकबा सत्यापन अनावरी से अधिक कर दिया है। लिप्ती में भी पिछले साल औसत उत्पादन 15.72 क्विं. से बढक़र 20.15 क्विं. कर दिया गया है।

लिप्ती में भी पटवारी ने 66 किसानों का सत्यापन अनावरी से अधिक कर दिया है। इन दोनों केंद्रों में सबसे ज्यादा धान खरीदा गया है। छाल में 24-25 में अनावरी 16.53 क्विं. था जो इस बार 20.68 क्विं. हो गया है। घरघोड़ा के कुडुमकेला उपार्जन केंद्र में औसत उत्पादन 13.60 क्विं. से बढक़र इस बार 16.45 क्विं. हो गया। पिछले बार हुए घपले के बीच टेंडा नवापारा में भी अनावरी संदेहास्पद है। पिछली बार 13.76 क्विं. थी जो 17.76 क्विं. के हिसाब से सत्यापन किया जा रहा है।

उपार्जन केंद्र में कैसे तय किया अनावरी
अनावरी तैयार करने के लिए आधार फसल कटाई प्रयोग होना चाहिए। जिसमें गांव ही इकाई होनी चाहिए। किसी गांव में उपजाऊ जमीन है तो वहां एक एकड़ में 25 क्विं. धान भी होता है। अब वहां पटवारी को कहा जा रहा है कि आप 18 क्विं. के हिसाब से सत्यापन करें। प्रत्येक गांव में उत्पादन अलग होता है। नदी के पाट में धान की उपज 25 क्विं. से भी अधिक हो जाता है। यहां किसान को कहा जाए कि आप 19 क्विं. के हिसाब से धान बेचेंगे तो क्या होगा।

तिउर में प्रति एकड़ 23 क्विं. अनावरी
खरसिया में करोड़ों का धान गबन करने वाली तुरेकेला और तिउर केंद्र की अनावरी संदेहास्पद है। 24-25 में तुरेकेला का 23.37 क्विं. और तिउर का 21.15 क्विं. था। 25-26 में तुरेकेला का 18.64 क्विं. और तिउर का 23.12 क्विं. हो गया। महज एक ही साल में उपज में इतना अंतर तो आ नहीं सकता। अनावरी रिपोर्ट ही संदेहास्पद है।

पटवारी को मिल रहा नोटिस, किसान भी चुप
जमरगी डी में किसानों ने इसके विरोध में गाडिय़ां खड़ी कर दी। अनावरी रिपोर्ट तैयार करने के लिए क्या आधार लिया गया है। पुसौर में महानदी किनारे पडिग़ांव में इस वर्ष अनावरी 19.27 क्विं. है जबकि नदी से दूर बिंजकोट में यह 19.99 क्विं. है। गढ़उमरिया में भी अनावरी पडिग़ांव से अधिक है। यह वाकई चौंंकाने वाले आंकड़े हैं।Kelo Pravah


क्या है अनावरी रिपोर्ट?

अनावरी रिपोर्ट दरअसल फसल उत्पादन का आकलन होती है। इसमें यह अनुमान लगाया जाता है कि किसी क्षेत्र में प्रति एकड़ कितनी उपज हुई है। यह रिपोर्ट आमतौर पर निम्न आधारों पर तैयार की जाती है—

  • मौसम की स्थिति

  • वर्षा का स्तर

  • बुवाई का रकबा

  • खेतों का सर्वे

  • पटवारी और राजस्व अमले की रिपोर्ट

  • कृषि विभाग के आंकड़े

इसी अनावरी रिपोर्ट को आधार मानकर यह तय किया जाता है कि किसी किसान को कितना धान बेचने का टोकन मिलेगा।


टोकन प्रणाली क्या है और क्यों जरूरी है?

धान खरीदी के दौरान अव्यवस्था न फैले, इसके लिए सरकार ने ऑनलाइन टोकन प्रणाली लागू की है। इस प्रणाली के तहत—

  • किसान को पहले पंजीयन कराना होता है

  • फिर निर्धारित मात्रा के अनुसार टोकन जारी होता है

  • उसी टोकन के आधार पर किसान मंडी या खरीदी केंद्र में धान बेच सकता है

समस्या तब पैदा होती है जब टोकन की मात्रा वास्तविक उत्पादन से कम तय कर दी जाती है।


कहीं 16 क्विंटल तो कहीं 20 क्विंटल: फर्क क्यों?

इस साल अनावरी रिपोर्ट के आधार पर अलग–अलग क्षेत्रों में उत्पादन का आंकलन अलग–अलग किया गया है।

  • कुछ क्षेत्रों में प्रति एकड़ 16 क्विंटल

  • कुछ में 18 क्विंटल

  • और कुछ इलाकों में 20 क्विंटल तक

यही असमानता किसानों को खटक रही है। कई किसान यह सवाल उठा रहे हैं कि—

  • जब मिट्टी, बीज और मेहनत एक जैसी है

  • जब सिंचाई और खाद समान है

  • तो फिर उत्पादन का आकलन अलग–अलग क्यों?


किसानों का कहना: हकीकत कुछ और है

किसानों का साफ कहना है कि अनावरी रिपोर्ट ज़मीनी सच्चाई से मेल नहीं खा रही

कई किसानों के अनुसार—

  • इस साल अच्छी बारिश हुई

  • उन्नत किस्म के बीज इस्तेमाल किए गए

  • खाद और कीटनाशकों पर भारी खर्च किया गया

  • उत्पादन 22 से 25 क्विंटल प्रति एकड़ तक हुआ

लेकिन अनावरी रिपोर्ट में कम आंकलन होने के कारण उन्हें सिर्फ 16 या 20 क्विंटल का ही टोकन मिल रहा है।


अतिरिक्त धान का क्या करें किसान?

यह सबसे बड़ा सवाल है।

जब किसान के पास तय सीमा से ज्यादा धान होता है तो उसके सामने तीन विकल्प बचते हैं—

  1. कम दाम पर निजी व्यापारियों को बेचना

  2. भंडारण करना, जिसमें नुकसान और खर्च दोनों

  3. अवैध तरीके से बेचने की मजबूरी, जो जोखिम भरा है

सरकारी समर्थन मूल्य न मिलने से किसान को सीधा आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।


अनावरी रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया पर सवाल

कई किसान संगठनों और ग्रामीण प्रतिनिधियों ने अनावरी रिपोर्ट की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं।

मुख्य आरोप इस प्रकार हैं—

  • खेतों का वास्तविक सर्वे नहीं हुआ

  • पटवारी ने अनुमान के आधार पर रिपोर्ट बनाई

  • कुछ जगह पुराने आंकड़ों का इस्तेमाल

  • मौसम और उत्पादन में आए बदलाव को नजरअंदाज किया गया

किसानों का कहना है कि अगर सही तरीके से सर्वे किया जाए तो उत्पादन का आंकड़ा कहीं ज्यादा आएगा।


छोटे और सीमांत किसानों पर ज्यादा असर

इस व्यवस्था का सबसे ज्यादा असर छोटे और सीमांत किसानों पर पड़ रहा है।

  • जिनके पास 1–2 एकड़ जमीन है

  • जिनकी पूरी आमदनी धान पर निर्भर है

  • जिन्होंने कर्ज लेकर खेती की है

जब उन्हें कम टोकन मिलता है तो उनकी पूरी आर्थिक योजना बिगड़ जाती है


प्रशासन का पक्ष क्या है?

प्रशासन का कहना है कि—

  • अनावरी रिपोर्ट एक मानक प्रक्रिया के तहत बनाई जाती है

  • सभी क्षेत्रों में एक जैसी स्थिति नहीं होती

  • कहीं बारिश कम हुई, कहीं रोग लगे

  • इसलिए उत्पादन का आंकलन अलग–अलग है

प्रशासन यह भी कहता है कि जरूरत पड़ने पर पुनः सर्वे का प्रावधान है।


पुनः सर्वे की मांग तेज

किसान संगठन और जनप्रतिनिधि अब—

  • अनावरी रिपोर्ट की पुनः समीक्षा

  • वास्तविक उत्पादन के आधार पर टोकन बढ़ाने

  • और किसानों को न्याय दिलाने की मांग कर रहे हैं

कई जगहों पर ज्ञापन सौंपे गए हैं और आंदोलन की चेतावनी भी दी गई है।


टोकन कटौती का सामाजिक असर

यह सिर्फ आर्थिक नहीं बल्कि सामाजिक समस्या भी बनती जा रही है—

  • गांवों में तनाव बढ़ रहा है

  • किसान और प्रशासन के बीच अविश्वास

  • कर्ज चुकाने में दिक्कत

  • खेती से मोहभंग

जब किसान को उसकी मेहनत का सही मूल्य नहीं मिलता, तो उसका खेती से भरोसा उठने लगता है।


समाधान क्या हो सकता है?

इस समस्या से निपटने के लिए कुछ ठोस कदम जरूरी हैं—

  1. डिजिटल और सैटेलाइट सर्वे का उपयोग

  2. किसानों की मौजूदगी में खेत का निरीक्षण

  3. उत्पादन बढ़ने पर टोकन संशोधन की व्यवस्था

  4. शिकायत के लिए सरल और तेज प्रक्रिया

  5. पंचायत स्तर पर पारदर्शिता

अगर इन उपायों को अपनाया जाए तो किसानों का भरोसा फिर से कायम हो सकता है।

अनावरी रिपोर्ट के आधार पर टोकन काटने की व्यवस्था अगर सही और पारदर्शी हो, तो यह किसानों और सरकार दोनों के लिए लाभकारी हो सकती है। लेकिन जब यह रिपोर्ट जमीनी हकीकत से दूर हो जाती है, तब यह किसानों के लिए बड़ी परेशानी बन जाती है।

कहीं 16 क्विंटल तो कहीं 20 क्विंटल की सीमा ने यह साफ कर दिया है कि व्यवस्था में सुधार की जरूरत है। किसान सिर्फ यही चाहता है कि उसे उसकी मेहनत का पूरा और सही मूल्य मिले। जब तक यह सुनिश्चित नहीं किया जाता, तब तक अनावरी रिपोर्ट और टोकन कटौती का मुद्दा किसानों के बीच चिंता और आक्रोश का कारण बना रहेगा।

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